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    धर्म मेहमान का पन्ना राष्ट्रीय संपादकीय

    गंगा का महत्व: जीवन, मोक्ष और पर्यावरण की पुकार

    Nikunj GuptaBy Nikunj GuptaJune 20, 2026No Comments8 Mins Read
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    गंगा का महत्व
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    लेखक: डाक्टर दीपक गोस्वामी

    भगवान श्रीकृष्ण ने गीता के दसवें अध्याय में कहा कि नदियों में मैं गंगा हूँ। वही गंगा आज मैली होकर अपने बच्चों से जीवन माँग रही है। यह केवल नदी का सवाल नहीं, हमारी पूरी सभ्यता के जीने मरने का सवाल है। शब्दों से माँ कहना बहुत आसान है, काम से माँ मानना बहुत कठिन है। हम मोक्ष के लिए गंगा नहाने जाते हैं, पुरखों की अस्थि बहाते हैं, कुंभ में डुबकी लगाते हैं। मगर वही हाथ जो पूजा में जुड़ते हैं, वही हाथ पन्नी, नाले का पानी, कारखाने का जहर और कूड़ा गंगा की गोद में डाल देते हैं। यह दो मुँह की बात ही सबसे बड़ा झूठ है। इस लेख में हम गंगा का महत्व और इसके संरक्षण के उपायों पर चर्चा करेंगे।

    गंगा का महत्व: सभ्यता का आधार

    समाज ने तीर्थ को घूमने की जगह बना दिया, धर्मशाला को होटल बना दिया और योग को मौज मस्ती बना दिया। पहले गाँव का तालाब सबका साँझा था। साल में एक बार पूरा गाँव मिलकर उसकी सफाई करता था। हर घर के आँगन में पीपल और नीम का पेड़ जरूरी था। आज घर छोटे हो गए, कचरा बड़ा हो गया। हमारे बच्चे दिन भर नेता की बातों में लगे रहते हैं, पर नदी तालाब की बात कोई नहीं करता। सरकारी आँकड़ा बताता है कि देश का 70 प्रतिशत जमीन के नीचे का पानी गंदा हो चुका है। जाँच में पाया गया कि गंगा के 97 जगहों में से 76 जगह का पानी नहाने लायक भी नहीं बचा। यह हमारे समाज की सोच का मर जाना है। इसका उपाय है कि हर गाँव में पानी की देखरेख के लिए समिति बने। स्कूल में बच्चों को नदी के बारे में पढ़ाया जाए। हर अच्छे काम से पहले 5 पेड़ लगाने का नियम बने।

    आर्थिक विकास और गंगा का संकट

    हमने विकास का मतलब केवल सीमेंट, सड़क और पहाड़ तोड़ना समझ लिया। गंगा के आसपास के खेतों से देश के 40 प्रतिशत लोगों का खाना निकलता है। 47 प्रतिशत खेती का पानी इसी इलाके से आता है। अगर गंगा सूख गई तो 52 करोड़ लोगों के सामने खाने का संकट खड़ा हो जाएगा। विश्व बैंक कहता है कि गंदे पानी से होने वाली बीमारी के कारण भारत को हर साल 7.7 लाख करोड़ रुपये का नुकसान होता है। हम उस मुर्गी को ही मार रहे हैं जो सोने का अंडा देती है। इसका उपाय है कि पैसे और पेड़ को साथ जोड़ा जाए। नदी के एक लीटर साफ पानी की कीमत तय हो। कारखानों से एक बूँद भी गंदा पानी बाहर न निकले, यह कानून बने। जो किसान जहर बिना खेती करे उसे सरकार सीधा पैसा दे। नमामि गंगे पर अब तक 42 हजार करोड़ से ज्यादा खर्च हो चुका है, पर जब तक लोग साथ नहीं देंगे तब तक कोई काम पूरा नहीं होगा। [INTERNAL_LINK_HOLDER]

    राजनीति, नैतिकता और जल संरक्षण

    राजनीति जरूरी है, पर वह रास्ता है, मंजिल नहीं। जब हर बात में वोट दिखे और नदी में बहता जहर न दिखे, तो समझो आँखों में खराबी है। पानी जीवन है, जीवन के साथ खेल नहीं होना चाहिए। गाँव के सरपंच से लेकर देश के मंत्री तक, हर नेता का काम तब अच्छा माना जाए जब उसके इलाके की नदी, तालाब और हवा साफ हो। इसका उपाय है कि पानी को केवल राज्य का मामला न माना जाए। इसे पूरे देश की संपत्ति घोषित किया जाए। सभी दलों से ऊपर उठकर नदी के लिए एक अलग संसद बनाई जाए।

    पानी का वैश्विक संकट और गंगा का योगदान

    सबसे बड़ा सच यह है कि पानी बिना एक दिन भी कोई जिंदा नहीं रह सकता। हमारा शरीर 70 प्रतिशत पानी से बना है। दुनिया कहती है कि 2030 तक दुनिया के 40 प्रतिशत लोग पानी के लिए तरसेंगे। गंगा केवल भारत की नदी नहीं है। बंगाल की खाड़ी के हजारों मछली और जीव गंगा के पानी पर पलते हैं। आज हर दिन 290 करोड़ लीटर गंदा पानी गंगा में गिरता है। उसमें से आधा भी साफ नहीं होता। इसका उपाय है कि हर घर के नल से निकलने वाले पानी का 80 प्रतिशत फिर से काम में लाया जाए। शहर बसाते समय तालाब और जोहड़ बनाना जरूरी किया जाए।

    आस्था, विज्ञान और गंगाजल की पवित्रता

    वेद कहते हैं कि जल ही सब कुछ है। गंगा केवल दो गैसों का जोड़ नहीं है, वह एक जीती जागती शक्ति है। विज्ञान ने माना है कि गंगाजल में ऐसे छोटे जीव होते हैं जो बीमारी फैलाने वाले कीटाणु को खा जाते हैं। इसी कारण गंगाजल सालों तक खराब नहीं होता। पुराने समय में ताँबे का सिक्का पानी में डालते थे, क्योंकि ताँबा पानी को साफ करता है। यह अंधेर नहीं था, यह पुराने लोगों का विज्ञान था। सबसे बड़ी बात यह है कि गंगा तब तक मोक्ष देगी जब तक वह खुद जिंदा है। मरी हुई नदी किसी को पार नहीं लगा सकती। इसका उपाय है कि आस्था और समझ को साथ लेकर चलें। घाट पर कपड़े छोड़ना बंद करें। दीप जलाने के लिए पत्ते के दीये काम में लें। भगवान की मूर्ति मिट्टी की बनाएं और उसे घर के टब में ही विसर्जित करें।

    पंद्रह सवाल, पंद्रह जवाब: समाधान की राह

    • क्या दुनिया नेता की बातों से चलेगी? नहीं, दुनिया पानी से चलेगी। उपाय है कि कोई भी नियम बनाते समय पहले नदी की सोचो, फिर कुर्सी की।
    • क्या नेता बनना ही सब कुछ है? नहीं, सबके काम आना ही बड़ा काम है। उपाय है कि स्कूल में बच्चों को सेवा के लिए नंबर दिए जाएँ।
    • क्या राजनीति ही आखिरी मकसद है? नहीं, पेड़ और पानी बचाना मकसद है। उपाय है कि हर पार्टी अपने वादे में नदी के लिए एक पन्ना जरूर लिखे।
    • क्या पैसा ही सब कुछ है? नहीं, मन का चैन सब कुछ है। उपाय है कि बच्चों को कम चीजों में खुश रहना सिखाया जाए।
    • क्या फोन की छोटी फिल्म ही जिंदगी है? नहीं, असली काम ही जिंदगी है। उपाय है कि दिन में एक घंटा फोन बंद कर पेड़ के पास बैठो।
    • क्या खाने पीने मौज करने के लिए जन्म हुआ है? नहीं, मन को जोड़ने के लिए जन्म हुआ है। उपाय है कि हफ्ते में एक दिन व्रत रखो और फालतू खर्च बंद करो।
    • क्या हमारे पुराने ग्रंथ यही सिखाते हैं? नहीं, वे मन पर काबू रखना सिखाते हैं। उपाय है कि गीता की कर्म वाली बातें बच्चों को पढ़ाई जाएँ।
    • क्या समाज के काम की चाहत खत्म हो गई? नहीं, बस रास्ता नहीं मिल रहा। उपाय है कि जो युवा नदी बचाए उसे योद्धा की तरह सम्मान दो।
    • क्या जिंदगी सिर्फ आज के लिए है? नहीं, हमें सात पीढ़ी आगे तक सोचना धर्म सिखाता है। उपाय है कि हर जन्मदिन पर एक पेड़ लगाना जरूरी रिवाज बने।
    • क्या सबके चेहरे पर उदासी है? हाँ, क्योंकि हम पेड़ और नदी से दूर हो गए। उपाय है कि हर महीने एक बार जंगल घूमने जाना नियम बने।
    • क्या अच्छे बुरे की समझ खत्म हो गई? लगभग खत्म है, पर फिर जगा सकते हैं। उपाय है कि गंदगी फैलाने पर सजा हो और साफ रखने वाले को इनाम मिले।
    • क्या जिंदगी सस्ती हो गई? हाँ, क्योंकि हमने पानी को सस्ता समझ लिया। उपाय है कि लोगों को बताया जाए कि एक बोतल पानी बनाने में कितनी मेहनत लगती है।
    • क्या हमें बच्चों की फिक्र नहीं? सच है, फिक्र नहीं है। उपाय है कि हर बच्चे के नाम पर पानी का खाता खुले, जिसमें पैसों की जगह पेड़ जमा हों।
    • क्या सिर्फ सड़क बनाने से देश आगे बढ़ेगा? नहीं बढ़ेगा। उपाय है कि जहाँ सड़क बने वहाँ साथ में नहर, पेड़ और तालाब भी बने।
    • क्या पेड़ काटकर, नदी मारकर हम आगे बढ़ सकते हैं? कभी नहीं। उपाय है कि विकास का नया नियम बने कि पहले धरती, फिर कारखाना, फिर बाजार।

    पाँच संकल्प: गंगा के लिए हमारी जिम्मेदारी

    • मैं खुद गंदगी नहीं डालूँगा। इसका हिसाब है कि अगर एक आदमी रोज एक किलो कचरा बचाए तो 140 करोड़ लोग रोज 140 करोड़ किलो कचरा बचाएँगे।
    • जो गंदगी डाले उसे टोकूँगा। इसका हिसाब है कि चुप रहना पाप में साथ देना है, बोलना नदी को बचाना है।
    • पानी साफ रखूँगा। इसका हिसाब है कि घर का गंदा पानी साफ करके फिर से काम में लेना ही गंगा की पूजा है।
    • गाँव का तालाब बचाऊँगा। इसका हिसाब है कि एक भरा तालाब सौ चापाकल के बराबर पानी देता है।
    • अंधेरा नहीं, उजाला चुनूँगा। इसका हिसाब है कि घाट पर कपड़ा छोड़ना नदी का गला दबाना है, और ताँबे का सिक्का डालना पानी को दवा देना है।

    जिंदगी बिना एसी के कट जाएगी, पर साफ हवा बिना नहीं कटेगी। बिना कार के कट जाएगी, पर साफ पानी बिना नहीं कटेगी। बिना पैसे के कट जाएगी, पर रोटी बिना नहीं कटेगी। और ये रोटी, पानी, हवा सब हमें गंगा, यमुना, जंगल, मिट्टी और गाय से मिलते हैं। हमने अपना कमरा ठंडा करने के लिए पूरी धरती को गरम कर दिया। अभी भी वक्त है। गंगा को बस नदी रहने दो, माँ तो वह पहले से ही है। उसे बूढ़े माँ बाप की तरह घर से बाहर मत निकालो। आज का बस एक ही संकल्प लो कि मोक्ष तभी मिलेगा जब तुम जिंदा रहोगे, और जिंदा तभी रहोगे जब गंगा जिंदा रहेगी। इसलिए हर साँस के साथ बोलो हर हर गंगे, और हर काम के साथ करो नमामि गंगे। यही पूरी बात का सार है, यही रोग का इलाज है, और यही जीत का फार्मूला है।

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