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    मेहमान का पन्ना राष्ट्रीय साहित्य

    डॉ. बशीर बद्र: सफ़र थमा, विरासत नहीं

    Nikunj GuptaBy Nikunj GuptaJune 16, 2026No Comments12 Mins Read
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    डॉ. बशीर बद्र
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    लेखक: सुल्तान अली

    उर्दू अदब और शायरी की दुनिया में कुछ नाम ऐसे होते हैं, जो केवल अपनी शायरी तक ही सीमित नहीं रहते, बल्कि एक अहसास, एक याद और एक सांस्कृतिक विरासत बन जाते हैं। एक ऐसा ही शायर जिसकी ग़ज़लों ने प्रेम को शब्द दिए, बिछड़न को आवाज़ दी और इंसानी रिश्तों की नाज़ुक भावनाओं को ऐसी सादगी के साथ अभिव्यक्त किया कि उनके अशआर आम आदमी की ज़िंदगी का हिस्सा बन गए। शायद यही कारण है कि उनके अनेक शेर आज भी लोगों की ज़बान पर उसी आत्मीयता के साथ मौजूद हैं, जैसे वे किसी व्यक्तिगत अनुभव की कहानी कह रहे हों।

    “उजाले अपनी यादों के, हमारे साथ रहने दो,
    न जाने किस गली में ज़िंदगी की शाम हो जाए ।”

    यह सिग्नेचर शेर उर्दू शायरी के उस महान शायर का है, जिसने अपनी सादगी, संवेदनशीलता और मानवीय भावनाओं की गहरी समझ से लाखों दिलों को छुआ। वह नाम है सदाबहार शायर और मुशायरों की जान डॉ. बशीर बद्र । उर्दू अदब की दुनिया में यह नाम किसी पहचान का मोहताज नहीं है। डॉ. बशीर बद्र का ये शेर ज़िन्दगी को एक आईने की तरह हमारे सामने रख देता है कि किस तरह से अच्छे रिश्तों और ख़ूबसूरत यादों को अपने साथ रखना बहुत ज़रूरी है, क्योंकि ज़िंदगी का कोई भरोसा नहीं है । उनकी शायरी केवल साहित्य प्रेमियों तक ही सीमित नहीं रही, बल्कि आम लोगों की ज़बान और दिलों तक पहुँची। ग़ज़ल के दो मिसरों में अपनी पूरी बात बड़ी ही सरलता और ख़ूबसूरती से कह देना, डॉ. बशीर बद्र को इस कला में महारत हासिल थी, जो हमें उनकी ग़ज़लों में दिखाई देता है –

    “घरों पे नाम थे, नामों के साथ ओहदे थे,
    बहुत तलाश किया कोई आदमी न मिला।”

    डॉ. बशीर बद्र: जीवन, संघर्ष और शिक्षा

    इस शेर में डॉ. बशीर बद्र साहब आज के समाज की एक कड़वी सच्चाई बयाँ करते हैं। कि लोगों के पास नाम, शोहरत और बड़े-बड़े ओहदे तो हैं, लेकिन सच्ची इंसानियत कम ही दिखाई देती है। उनके लिए एक अच्छा इंसान होना हर ओहदे और पहचान से बड़ा था । डॉ. बशीर बद्र का जन्म 15 फ़रवरी 1935 को फ़ैज़ाबाद (उत्तर प्रदेश) में हुआ था। उनका पूरा नाम सैयद मोहम्मद बशीर था । उनके वालिद सैयद मोहम्मद नज़ीर पुलिस विभाग में थे। अभी बद्र साहब की स्कूली शिक्षा पूरी भी नहीं हुई थी कि उनके वालिद साहब का इंतकाल हो गया। परिवार की ज़िम्मेदारियाँ अचानक उनके कंधों पर आ गईं। परिस्थितियाँ ऐसी बनी कि उन्हें अपनी पढ़ाई तक बीच में छोड़नी पड़ी।

    “ये फूल मुझे कोई विरासत में मिले हैं,
    तुमने मेरा काँटों भरा बिस्तर नहीं देखा।”

    डॉ. बशीर बद्र का यह शेर उन लोगों के लिए है जो दूसरों की सफलता तो देख लेते हैं, लेकिन उस सफलता के पीछे छिपे संघर्ष, मेहनत और दर्द को नहीं देख पाते। पढ़ाई छूटने के बाद कुछ वर्षों तक बशीर बद्र साहब भले ही औपचारिक शिक्षा से दूर रहे हों, लेकिन जीवन के अनुभवों से उन्होंने बहुत कुछ सीखा। यही अनुभव आगे चलकर उनकी सफलता और व्यक्तित्व के निर्माण में मील का पत्थर साबित हुए। साहित्य से उनका रिश्ता कभी नहीं टूटा। बचपन से ही उन्हें भाषा और शायरी से गहरा लगाव जो था। बाद में उन्होंने अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी से अपनी उच्च शिक्षा प्राप्त की । अलीगढ़ का साहित्यिक माहौल उनके व्यक्तित्व और लेखन को निखारने में बहुत मददगार साबित हुआ। छात्र जीवन के दौरान ही वे अपनी शायरी और ख़ास अंदाज़-ए-बयाँ के लिए मशहूर हो चुके थे। अपने देश में ही नहीं बल्कि विदेशों में भी डॉ. बशीर बद्र मुशायरों की जान हुआ करते थे । मुशायरों में उनके शेर बड़ी दिलचस्पी से सुने जाते थे। उनका एक मशहूर शेर है –

    “कोई हाथ भी न मिलाएगा, जो गले मिलोगे तपाक से,
    ये नए मिज़ाज का शहर है ज़रा फ़ासले से मिला करो ।”

    बशीर बद्र साहब ने एएमयू से 1969 में उर्दू साहित्य में एम.ए. और 1973 में “आज़ादी के बाद की ग़ज़ल का तनक़ीदी मुताला” विषय पर पीएचडी की थी। कहा जाता है कि अपने शोध-कार्य में जिन शेरों का विश्लेषण किया गया, उनमें लगभग चौरासी शेर उनके अपने भी शामिल थे। यह उनकी रचनात्मक क्षमता और आत्मविश्वास का प्रमाण ही है। उनकी लोकप्रियता का अंदाज़ा इस बात से भी लगाया जा सकता है जिसका ज़िक्र मशहूर शायर शकील जमाली भी एक इंटरव्यू में करते हैं कि जब डॉ. बशीर बद्र साहब यूनिवर्सिटी में ख़ुद एक विद्यार्थी थे तो उस समय उनकी शायरी सिलेबस में पढ़ाई जा रही थी । बाद में पीएचडी पूरी होने के बाद उन्होंने कुछ समय तक एएमयू के उर्दू विभाग में अध्यापन भी किया । अलीगढ़ के बाद उनके जीवन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा मेरठ में बीता। ये वही दौर था जब बशीर बद्र साहब शायरी की दुनिया में बुलंदी को छू रहे थे । उन्होंने मेरठ कॉलेज के उर्दू विभाग में लगभग सत्रह वर्षों तक अध्यापन किया । बाद में वे विभागाध्यक्ष भी बने। अपने सरल स्वभाव और गहरी साहित्यिक समझ के कारण वे विद्यार्थियों के बीच बेहद लोकप्रिय थे । सही मायने में डॉ. बशीर साहब ने ज़िंदगी को खुलकर जिया है, साथ ही ज़िंदगी में आने वाली मुश्किलों और कठिनाइयों को एक चुनौती के रूप में स्वीकार भी किया है । उनका एक बड़ा ही मशहूर शेर है –

    “हम भी दरिया हैं, हमें अपना हुनर मालूम है,
    जिस तरफ़ भी चल पड़ेंगे रास्ता हो जाएगा।”

    इस शेर में डॉ. बशीर बद्र साहब आत्मविश्वास का पिटारा खोलकर हमारे सामने रख देते हैं। अगर इंसान को अपनी काबिलियत पर भरोसा हो तो वह मुश्किल हालात में भी अपना रास्ता बना लेता है। जैसा कि मैं पहले भी कह चुका हूँ कि डॉ. बशीर बद्र की शायरी की सबसे बड़ी ख़ूबी उसकी सादगी है। उन्होंने कठिन और भारी-भरकम शब्दों की जगह आम बोलचाल की भाषा में गहरी बातें कहीं। यही वजह है कि उनके शेर सीधे लोगों के दिलों तक पहुँचकर उनकी ज़बान पर चढ़ जाते हैं। आधुनिक जीवन की समस्याओं, अकेलेपन, बदलते रिश्तों और समाज की बदलती तस्वीर को उन्होंने अपनी ग़ज़लों में बड़ी ही ख़ूबसूरती से जगह दी। अगर देखा जाए तो डॉ. बशीर बद्र ने उर्दू ग़ज़ल को एक नया अंदाज़ दिया ।

    “कोई फूल धूप की पत्तियों में, हरे रिबन से बंधा हुआ,
    वो ग़ज़ल का लहजा नया-नया, न कहा हुआ न सुना हुआ।”

    यह शेर उनकी रचनात्मकता का परिचय देता है। बशीर बद्र ने मीर तक़ी मीर, मिर्ज़ा ग़ालिब, अल्लामा इकबाल जैसे महान शायरों की परंपरा को निभाते हुए ग़ज़ल को नया रंग और एक नई शैली देने की भी कोशिश की। उनकी यही विशेषता उन्हें अपने समकालीन शायरों से अलग पहचान दिलाती है। [INTERNAL_LINK_HOLDER] वे केवल शायर ही नहीं, बल्कि गहन अध्ययन वाले विद्वान भी थे। उर्दू और हिंदी के साथ-साथ अंग्रेज़ी और फ़ारसी भाषा पर भी उनकी अच्छी पकड़ थी। उन्होंने कई चर्चित ग़ज़ल संग्रह लिखे जिनमें इकाई, आमद, आहट, आस और उजाले अपनी यादों के आदि शामिल हैं। उनकी कई पुस्तकों का विदेशी भाषाओं में अनुवाद भी हुआ, जिससे उनकी शायरी दुनिया के कोने-कोने तक पहुँची ।

    डॉ. बशीर बद्र और मेरठ के दंगे

    सन् 1987 के मेरठ दंगे डॉ. बशीर बद्र के जीवन का सबसे दुखद अध्याय साबित हुए। इन दंगों में उनका घर, उनकी किताबें और वर्षों की मेहनत से संकलित साहित्यिक सामग्री जलकर राख हो गई। अनेक अप्रकाशित ग़ज़लें भी नष्ट हो गईं। यह किसी भी लेखक के लिए बहुत बड़ा आघात था। प्रसिद्ध फ़िल्म निर्देशक विशाल भारद्वाज ने एक इंटरव्यू में इस घटना का ज़िक्र करते हुए बताया था कि मेरठ दंगों में बशीर बद्र साहब की अनेक नई ग़ज़लें भी जल गई थीं, जो अभी कहीं प्रकाशित भी नहीं हुई थीं। इस बात का उन्हें गहरा दुःख था। बाद में उनके द्वारा जब डॉ. बशीर बद्र साहब को यह बताया गया कि उन ग़ज़लों का बड़ा हिस्सा उन्हें ज़ुबानी याद है, तो यह सुनकर उनके चेहरे पर खुशी लौट आई। यह घटना उनकी दुख की घड़ी में एक आस और अपनी रचनाओं से गहरे जुड़ाव को भी दर्शाती है। उनका एक मशहूर शेर है –

    “लोग टूट जाते हैं, एक घर बनाने में,
    तुम तरस नहीं खाते बस्तियाँ जलाने में।”

    इस शेर में डॉ. बशीर बद्र साहब के उस दर्द को महसूस किया जा सकता है । कि कैसे एक घर बनाने में पूरी ज़िंदगी लग जाती है, लेकिन उसे उजाड़ने में कुछ पल ही लगते हैं। यह शेर नफ़रत और हिंसा के ख़िलाफ़ एक मज़बूत आवाज़ के साथ-साथ इंसानियत का संदेश भी देता है। मेरठ दंगों के बाद डॉ. बशीर बद्र साहब भीतर से मानो टूट चुके थे, उन्हें गहरा आघात पहुँचा था। इस घटना से वे उबर न सके और फिर मेरठ छोड़कर हमेशा के लिए भोपाल चले गए। जीवन के अंतिम वर्षों तक भोपाल ही उनका स्थायी निवास रहा और वहीं से वे साहित्यिक गतिविधियों से जुड़े रहे।

    डॉ. बशीर बद्र की साहित्यिक सेवाएँ और सम्मान

    डॉ. बशीर बद्र साहब की शायरी का मयार इतना ऊँचा है कि उनकी ग़ज़ल के एक-एक शेर पर पूरी किताब लिखी जा सकती है। कई विश्वविद्यालयों में डॉ. बशीर बद्र पर शोध कार्य और पीएचडी भी हुईं। डॉ. बशीर बद्र की साहित्यिक सेवाओं और उत्कृष्ट योगदान के लिए उन्हें पद्म श्री, साहित्य अकादमी पुरस्कार के अलावा कई अन्य पुरस्कारों से सम्मानित किया गया। बद्र साहब केवल एक शायर ही नहीं, बल्कि एक शिक्षक और शोधकर्ता भी थे। उन्होंने 1973 में अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी से पीएचडी पूरी की थी। बाद में कई बार उनका अलीगढ़ आना हुआ, लेकिन निजी जीवन और मुशायरों की व्यस्तता और कुछ परिस्थितियों के कारण वे अपनी डिग्री का प्रमाणपत्र नहीं ले पाए। लगभग सैंतालीस वर्ष बाद जब अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी ने उनकी पीएचडी की डिग्री उनके भोपाल स्थित घर भेजी, तो कहा जाता है कि डिग्री को देखकर वे भावुक हो गए और उसे अपने सीने से लगा लिया। चूँकि मैंने भी अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी से तालीम हासिल की है, मैं भी उसी चमन का बुलबुल हूँ इसलिए बशीर बद्र साहब का अलीगढ़ और एएमयू से लगाव मेरे लिए सहज ही अनुभूति का विषय बन जाता है। और मैं इस भाव को गहराई से महसूस कर सकता हूँ। मुझे लगता है कि बशीर बद्र साहब की आँखों में डिग्री पाकर जो भावुकता थी, वह केवल एक उपाधि प्राप्त करने की ख़ुशी नहीं थी, बल्कि एएमयू और अलीगढ़ से जुड़े उस अटूट रिश्ते की अभिव्यक्ति थी, जिसे समय और दूरी भी कम नहीं कर सके।

    मेरे परिवार का भी साहित्य से गहरा संबंध रहा है। मेरे मामू डॉ. हैदर अली जो वर्तमान में जामिया मिल्लिया इस्लामिया यूनिवर्सिटी के हिंदी विभाग में असिस्टेंट प्रोफ़ेसर हैं, उन्होंने डॉ. राही मासूम रज़ा पर एमफिल और प्रोफ़ेसर असग़र वजाहत के निर्देशन में पीएचडी की है । यही कारण है कि मुझे बचपन से ही घर में साहित्य और साहित्यकारों से जुड़ी अनेक बातें सुनने का अवसर मिलता रहा। और यही अनुभव मेरे विद्यार्थी जीवन में केवल शैक्षणिक नहीं, बल्कि एक गहरी साहित्यिक चेतना के निर्माण का आधार भी बना, जामिया में पढ़ाई के दौरान ये मेरा सौभाग्य ही था की मैं भी प्रोफ़ेसर असग़र वजाहत और प्रोफ़ेसर अब्दुल बिस्मिल्लाह साहब जैसे प्रख्यात कथाकारों की शिष्य परंपरा का हिस्सा बन सका। प्रोफ़ेसर असग़र वजाहत ने भी अपनी उच्च शिक्षा अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी से ही प्राप्त की है। अभी हाल ही में जब एक फ़िल्म की शूटिंग के चलते वजाहत साहब हैदर मामू के गाँव आए तो उनसे बहुत सारी बातें हुई जिनमें ज़्यादातर अलीगढ़ का ही ज़िक्र था।

    दिलचस्प बात यह है कि डॉ. बशीर बद्र की तरह डॉ. राही मासूम रज़ा भी अलीगढ़ को कभी नहीं भूल पाए। दोनों ही साहित्यकारों के व्यक्तित्व और लेखन में एएमयू और अलीगढ़ से जुड़ी यादें तथा अपनी मिट्टी के प्रति गहरा लगाव दिखाई देता है। राही साहब ने भी अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी से पीएचडी करने के बाद कुछ वर्षों तक उर्दू विभाग में अध्यापन किया था। बाद में वे मुंबई चले गए, जहाँ उन्होंने उपन्यास लेखन के साथ-साथ हिंदी फ़िल्मों और धारावाहिकों के लिए पटकथा और संवाद लिखे । जिसके चलते उनको बहुत कामयाबी भी मिली, लेकिन मुंबई की चमक-दमक के बीच भी उनके लेखन में अलीगढ़, अपना गौव (गंगौली) और अपने लोगों की यादें बार-बार लौटती रहीं।

    डॉ. राही मासूम रज़ा का एक मशहूर शेर है—
    “जिनसे हम छूट गए, अब वो जहाँ कैसे हैं,
    शाख़-ए-गुल कैसी है ख़ुशबू के मकाँ कैसे हैं।”

    यह शेर केवल बिछड़न का शेर नहीं है, बल्कि अपनी जड़ों से जुड़े रहने के उस भाव को भी बयाँ करता है जो डॉ. राही मासूम रज़ा और डॉ. बशीर बद्र दोनों के व्यक्तित्व और लेखन में दिखाई देता है। शायद यही कारण है कि चाहे वे मेरठ में रहे हों, भोपाल में या मुंबई में, अलीगढ़ उनके दिलों से कभी दूर नहीं हुआ। दरअसल अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी केवल एक शैक्षणिक संस्थान नहीं, बल्कि एक ऐसी परंपरा और तहज़ीब का नाम है, जिसने देश और दुनिया को असंख्य प्रतिभाएँ दी हैं। शायद यही किसी महान शिक्षण संस्थान की सबसे बड़ी पहचान होती है कि उसके विद्यार्थी दुनिया के किसी भी कोने में पहुँच जाएँ, लेकिन उनके दिल में अपनी यूनिवर्सिटी और अपने शहर के लिए एक विशेष स्थान हमेशा बना रहता है। अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी और अलीगढ़ शहर इस बात का प्रमाण है इसलिए यहाँ से पढ़ने और रहने वालों को अलीग के नाम से भी पुकारा जाता है। डॉ. बशीर बद्र साहब का अपनी पीएचडी की डिग्री को सीने से लगा लेना भी इसी भावनात्मक जुड़ाव और आत्मीय संबंध का एक मार्मिक प्रतीक था।

    डॉ. बशीर बद्र की शायरी की एक बड़ी ख़ूबी यह भी है कि उनके शेर सिर्फ़ पढ़े नहीं जाते, बल्कि महसूस किए जाते हैं। वे हमें रिश्तों की अहमियत, इंसानियत, मोहब्बत और उम्मीद का मतलब समझाते हैं। यही कारण है कि उनकी शायरी आज भी उतनी ही ताज़ा और प्रासंगिक लगती है जितनी दशकों पहले लगती थी।

    पिछले लगभग पंद्रह वर्षों से डॉ. बशीर बद्र साहब डिमेंशिया नामक बीमारी से जूझ रहे थे, जिसके चलते उन्होंने मुशायरों में जाना भी बंद कर दिया था। अभी कुछ समय पहले ही 28 मई 2026 में 91 वर्ष की उम्र में डॉ. बशीर बद्र साहब इस दुनिया को अलविदा कह गए। जिस दिन बशीर बद्र साहब इस दुनिया से रुख़्सत हुए, उनके चाहने वालों के साथ-साथ मानो ग़ज़ल भी उदास हो गई हो। उनकी ग़ज़लें, उनके विचार और उनकी मानवीय संवेदनाएँ आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा का स्रोत बनी रहेंगी। डॉ. बशीर बद्र साहब का सफ़र भले ही आज थम गया हो लेकिन उनकी विरासत हमेशा ज़िंदा रहेगी।

    “मुसाफ़िर हैं हम भी, मुसाफ़िर हो तुम भी,
    किसी मोड़ पर फिर मुलाक़ात होगी।”

    सादर,
    सुल्तान अली
    लेखक एवं अध्यापक
    पूर्व छात्र, जामिया मिल्लिया इस्लामिया नई दिल्ली और अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी, अलीगढ़

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