लेखक: डाक्टर दीपक गोस्वामी
“चाकी चाकी सब कहे, कीली कहे न कोय।
जो कीली से लाग रहे, बाल न बांका होय।।”
कबीर ने पाँच सौ साल पहले ट्वीट कर दिया था, पर हम आज तक रीट्वीट नहीं कर पाए। चाकी तो सबको दिखती है। ये जो संसार की मशीन है ना, इसके दो पाट दिन रात घिस-घिस कर रहे हैं। एक पाट सुख का, दूसरा दुख का। एक पाट तारीफ का, दूसरा गाली का। एक पाट प्रमोशन का, दूसरा लेऑफ का। दोनों पाट फुल स्पीड में घूम रहे हैं और बीच में हम गेहूँ के दाने बने पड़े हैं। एचआर की मीटिंग से निकलो तो बॉस का ताना, घर जाओ तो बीवी की शिकायत, फोन उठाओ तो क्रेडिट कार्ड वाले की धमकी। पिस गए ना? पर खेल कीली का है। कीली दिखती ही नहीं। वो बीच में खड़ी लोहे की खूँटी है। पूरी चाकी उसी के दम पर नाच रही है। जो दाना अक्लमंद है वो कीली से चिपक जाता है। साबुत बच जाता है। जो दाना ओवरस्मार्ट बनकर किनारे की तरफ लुढ़कता है, उसका आटा बन जाता है। फिर उसी आटे की रोटी बनाकर हम ही खाते हैं और कहते हैं लाइफ में टेस्ट ही नहीं है। [INTERNAL_LINK_HOLDER]
कीली क्या है? आपका आंतरिक केंद्र
कीली क्या है? कीली है तेरा सेंटर। तेरा स्टिल पॉइंट। तेरी रीढ़ की हड्डी। आज के जमाने में कीली का मतलब है कि जब पूरा लिंक्डइन आग लगा रहा हो कि फलाना 22 साल में करोड़पति बन गया, तब भी तू रात को चैन से सो सके। जब इंस्टाग्राम पर हर दूसरी रील तुझे फटी जीन्स और बाली में दुबई दिखा रही हो, तब भी तू अपनी सादी शर्ट में इज्जत से जी सके। जब शेयर मार्केट हर मिनट हरा-लाल हो रहा हो, तब भी तेरा बीपी न बढ़े। यही कीली है।
आधुनिक जीवन में मोक्ष और कीली का अर्थ
आज मोक्ष बाई-वन-गेट-वन-फ्री में मिल रहा है। 4999 में तीन दिन का स्पिरिचुअल रिट्रीट ले लो। पहाड़ों में जाकर सेल्फी खींचो, कैप्शन दो फाइंडिंग माईसेल्फ। भाई, तू पहाड़ पर नहीं मिलेगा, तू तो यहीं ट्रैफिक में फंसा हुआ है। मोक्ष कोई स्वीगी से ऑर्डर करने वाली चीज नहीं है। मोक्ष है जब बॉस गरियाए और तेरे अंदर आग न लगे। जब ईएमआई का मैसेज आए और सीने में दर्द न उठे। जब एक्स की शादी का कार्ड आए और हाथ न काँपे। ये है कीली से चिपकना। अर्थ का मतलब आज सिर्फ मनी-मनी हो गया है। बच्चा पैदा होते ही पूछते हैं पैकेज कितना होगा। लड़का थोड़ा सा बड़ा हुआ नहीं कि कोडिंग क्लास में डाल दिया। क्यों? क्योंकि कीली छोड़ दी। जीवन का अर्थ है जीना, सिर्फ कमाना नहीं। पर हमने साधन को ही साध्य बना दिया। अब गाड़ी है तो ड्राइवर चाहिए, ड्राइवर है तो बड़ा घर चाहिए, बड़ा घर है तो दिखाने के लिए मेहमान चाहिए, मेहमान हैं तो टेंशन चाहिए। ये लोलुपता है। ये तृष्णा है। ये चाकी का किनारा है। यहाँ आते ही पिसाई शुरू।
डिजिटल युग का शोर और कीली
देखो जरा अपने फोन को। सुबह आँख खुलती है तो सबसे पहले पाट घूमता है। नोटिफिकेशन, रील्स, शॉर्ट्स, मेल, मीम्स। एक डोपामिन का शॉट, फिर दूसरा, फिर तीसरा। शाम तक दिमाग का आटा बन चुका होता है। फूड डिलीवरी वाला, शॉपिंग ऐप वाला, डेटिंग ऐप वाला, सट्टा ऐप वाला, सब मिलकर तुझे किनारे की तरफ धकेल रहे हैं। और तू भी बड़े शौक से पिस रहा है। फिर कहता है एंग्जायटी हो गई, थैरेपी चाहिए। अरे थैरेपी तो कीली है। फोन साइड में रख दे, दस मिनट आँख बंद कर ले। साँस देख। बस। फ्री की थैरेपी।
विज्ञान और कीली: न्यूक्लियस की स्थिरता
विज्ञान भी यही कह रहा है। एटम को तोड़ो तो बीच में न्यूक्लियस मिलेगा। वही स्थिर है। इलेक्ट्रॉन तो पागलों की तरह घूमते हैं। अगर न्यूक्लियस हिल जाए तो धमाका हो जाता है। तेरा न्यूक्लियस क्या है? पैसा? वो तो कल मार्केट क्रैश में उड़ जाएगा। नाम? वो तो एक स्कैंडल में मिट्टी हो जाएगा। शरीर? वो तो बुखार में जवाब दे देगा। न्यूक्लियस है तेरा होश, तेरा धर्म, तेरा विवेक। मनोविज्ञान वाले इसे एंकर कहते हैं। जहाज का एंकर नहीं होगा तो तूफान में वो कहाँ जाएगा? चट्टान से टकराएगा।
सत्य और कीली: अडिग रहने की शक्ति
सत्य का हाल तो और बुरा है। अब सत्य वो नहीं जो है, सत्य वो है जो ट्रेंड कर रहा है। व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी से पीएचडी करके लोग बहस कर रहे हैं। एक मिनट में एक्सपर्ट, दूसरे मिनट में जज। टीवी पर चीख-चीख कर झूठ बेचा जा रहा है और हम खरीद रहे हैं। पर याद रख, झूठ के पाट कितने भी तेज घूमें, जो आदमी कीली यानी सच के साथ खड़ा है, उसका कुछ नहीं बिगड़ता। सुकरात को जहर पिला दिया, पर आज प्लेटो को कौन जानता है और सुकरात को कौन नहीं। गांधी को गोली मार दी, पर गोडसे को पूजता कौन है। कीली से लगे थे दोनों। कबीर ने भी यही संदेश दिया था।
अंतिम आदमी और सीईओ: कीली से दूरी का प्रभाव
अब अंतिम आदमी की बात। वो मजदूर जो दिहाड़ी पर है, धूप में ईंट उठा रहा है। वो भी पिस रहा है। पर अगर शाम को घर जाकर वो बीवी-बच्चों के साथ दो रोटी प्रेम से खा ले, बिना नेटफ्लिक्स के, बिना कंपेयर किए, तो वो पिसकर भी साबुत है। और उधर सीईओ देखो। प्राइवेट जेट है, पर नींद की गोली के बिना नींद नहीं। बीस डॉक्टर हैं, पर मन का इलाज नहीं। क्यों? क्योंकि वो कीली से सौ किलोमीटर दूर है। चाकी के बिल्कुल किनारे पर बैठा है।
कीली पकड़ने का उपाय: स्वयं का अवलोकन
तो उपाय क्या है? बहुत सिंपल। बहुत मुश्किल। दिन में तीन बार ब्रेक ले। फोन नहीं, खुद को देख। पूछ कि अभी मैं कहाँ हूँ। कीली के पास या किनारे पर। लालच आया? समझो किनारे की तरफ खिसक रहे हो। गुस्सा आया? समझो पाट तेज हुआ। किसी की तारीफ सुनकर फूल गए? किनारा। गाली सुनकर सिकुड़ गए? किनारा। जब सुख-दुख दोनों में तू एक सा रहे, समझो कीली पकड़ ली।
मॉडर्न कीली और डिजिटल कर्मयोग
मॉडर्न कीली पकड़नी है तो ये कर। खाना खाते वक्त रील बंद। माँ-बाप से बात करते वक्त फोन उल्टा। दफ्तर का काम ईमानदारी से, पर दफ्तर को भगवान मत बना। पैसा कमा, पर पैसे को मालिक मत बना। बॉडी दिखा, पर बॉडी में कैद मत हो। रिश्ते बना, पर रिश्तों में उलझ मत। ये है डिजिटल जमाने का कर्मयोग।
चाकी चलती रहेगी, कीली अमर है
कबीर ने चाकी देखी थी आटे वाली। हमने देख ली है डेटा वाली, ईएमआई वाली, लाइक्स वाली, एफओएमओ वाली। पाट सौ गुना तेज हो गए हैं। पर राहत की बात ये है कि कीली आज भी वहीं गड़ी है। न जंग लगी, न टूटी। तू बस हिम्मत करके बीच में आ जा। क्योंकि चाकी तो चलेगी ही। दुनिया है, चलती रहेगी। महंगाई बढ़ेगी, सरकारें बदलेंगी, वायरस आएँगे, वार होंगे। तू पाटों को रोक नहीं सकता। पर पिसना या साबुत रहना, ये तेरे हाथ में है।
अपनी कीली खोजना: अंतिम शपथ
तो आज से शपथ ले। किनारे की तरफ नहीं लुढ़कना। भीड़ जहाँ भाग रही है, वहाँ नहीं भागना। शोर जहाँ है, वहाँ से कान बंद करना। और बीच में, बिल्कुल बीच में, अपनी कीली खोजना। क्योंकि जो कीली से लाग रहे, वांका बाल न बांका होय। ये कोई शायरी नहीं है भाई, ये लाइफ का इंश्योरेंस है। बिना प्रीमियम वाला। गारंटीड। बस खुशियों की पोटली बांट और लूट ,मस्त है। जब समझ कुछ भी ना आये और ये जिया घबराए तो चिंता मत कर प्यारे मेरे युगल ठाकुर है तेरे सब गम और तकलीफ से तेरी रक्षा करने के लिए। करना क्या है बस।दो मिनिट कर आंख बंद और राधा कृष्ण राधा कृष्ण कृष्ण राधा नाम कहना सबके जीवन का सबसे कीमती गहना मुझे अब प्रभु शरण में रहना फिर देख सब कुछ फुर्रर्रर्रर्ररफ़्फ़।

