लेखक: देवानंद सिंह
पश्चिम बंगाल की राजनीति एक बार फिर राजनीतिक हमलों, सहानुभूति और उत्तराधिकार की बहस के केंद्र में है। तृणमूल कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव अभिषेक बनर्जी के काफिले पर कथित हमले के बाद राज्य की राजनीति में नए सवाल खड़े हो गए हैं। घटना के बाद जिस तरह मुख्यमंत्री ममता बनर्जी स्वयं अस्पताल पहुंचीं, पार्टी नेतृत्व सक्रिय हुआ और इसे लोकतांत्रिक मूल्यों पर हमला बताया गया, उससे यह चर्चा तेज हो गई है कि क्या तृणमूल कांग्रेस अभिषेक बनर्जी के लिए वैसी ही जनसहानुभूति का माहौल तैयार करना चाहती है, जैसा 1990 में हाजरा मोड़ की घटना के बाद ममता बनर्जी को मिला था।
हालांकि दोनों घटनाओं की तुलना करते समय राजनीतिक परिस्थितियों के अंतर को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। 1990 का बंगाल और 2026 का बंगाल पूरी तरह अलग राजनीतिक धरातल पर खड़े हैं। उस समय ममता बनर्जी एक संघर्षशील विपक्षी नेता थीं, जो लंबे समय से सत्ता में काबिज वाममोर्चा के खिलाफ सड़क पर लड़ रही थीं। हाजरा मोड़ पर हुए हमले ने उनकी संघर्षशील छवि को और मजबूत किया और जनता के बीच उन्हें व्यापक समर्थन मिला। लेकिन वह समर्थन केवल एक घटना का परिणाम नहीं था, बल्कि वर्षों के आंदोलन, जनसंपर्क और राजनीतिक संघर्ष की उपज था।
इसके विपरीत, आज तृणमूल कांग्रेस स्वयं सत्ता का केंद्र है। अभिषेक बनर्जी पार्टी के प्रभावशाली नेता हैं, लेकिन उनकी राजनीतिक यात्रा और सार्वजनिक छवि ममता बनर्जी से भिन्न है। विपक्ष लगातार उन्हें वंशवाद और परिवारवाद की राजनीति का प्रतीक बताता रहा है। ऐसे में किसी हमले की घटना को व्यापक जनसहानुभूति में बदलना उतना आसान नहीं दिखता, जितना तीन दशक पहले संभव था।
राजनीतिक समीक्षकों का मानना है कि बंगाल में विपक्ष की प्रकृति भी बदल चुकी है। 1990 के दशक में मुख्य मुकाबला कांग्रेस और वाममोर्चा के बीच था, जबकि आज भारतीय जनता पार्टी राज्य की प्रमुख विपक्षी शक्ति के रूप में उभर चुकी है। भाजपा और तृणमूल कांग्रेस के बीच सीधा और तीखा राजनीतिक संघर्ष चल रहा है। ऐसे माहौल में किसी भी घटना का राजनीतिक प्रभाव पहले की तुलना में अधिक विवादित और विभाजित हो जाता है।
इधर, कल्याण बनर्जी पर हुए कथित हमले ने भी राजनीतिक तनाव को और बढ़ा दिया है। तृणमूल कांग्रेस इसे लोकतंत्र पर हमला बता रही है, जबकि विपक्ष इन घटनाओं के राजनीतिक इस्तेमाल के आरोप लगा रहा है। अभिषेक बनर्जी पर हमले के मामले में भी विभिन्न दावे और प्रतिदावे सामने आ रहे हैं, जिससे राजनीतिक माहौल और गर्म हो गया है।
यह भी सच है कि तृणमूल कांग्रेस के भीतर अभिषेक बनर्जी को भविष्य के नेतृत्व के रूप में स्थापित करने की चर्चा लंबे समय से चल रही है। ऐसे में पार्टी का उनके पक्ष में आक्रामक रुख राजनीतिक रूप से स्वाभाविक माना जा सकता है। लेकिन राजनीति में केवल रणनीति ही निर्णायक नहीं होती। जनता किसी नेता को उसकी व्यक्तिगत राजनीतिक पहचान, संघर्ष और विश्वसनीयता के आधार पर स्वीकार करती है।
इसलिए अभिषेक बनर्जी पर हुए हमले की गंभीरता से जांच होना आवश्यक है और दोषियों पर कार्रवाई भी होनी चाहिए। साथ ही राजनीतिक दलों को भी इस तरह की घटनाओं को केवल चुनावी लाभ-हानि के चश्मे से देखने से बचना होगा। लोकतंत्र में हिंसा का कोई स्थान नहीं है, चाहे उसका शिकार सत्ता पक्ष हो या विपक्ष।
फिलहाल इतना कहना जल्दबाजी होगी कि यह घटना अभिषेक बनर्जी के राजनीतिक कद को वैसी ही मजबूती देगी जैसी कभी ममता बनर्जी को मिली थी। क्योंकि न परिस्थितियां वही हैं, न राजनीति का स्वरूप और न ही जनता की अपेक्षाएं। आने वाले समय में यह स्पष्ट होगा कि यह घटना बंगाल की राजनीति में निर्णायक मोड़ साबित होती है या फिर चुनावी शोर-शराबे के बीच एक और विवाद बनकर रह जाती है।

