पिता के हाथों में जली हुई देह, और सिस्टम ने कहा — दुर्घटना। जिस लापरवाही ने बच्चे को जिंदा जलाया, वो आज भी सड़क पर है।
प्रो. आरके जैन “अरिजीत” कहते हैं कि सिस्टम नहीं, हमारी सामूहिक चुप्पी की भी कीमत है।
कठोर सुधार की तत्काल आवश्यकता
अब समय केवल संवेदनाएं जताने का नहीं, कठोर सुधार लागू करने का है। केंद्र और राज्य सरकारों को तुरंत राष्ट्रीय बस सुरक्षा कोड लागू करना चाहिए। हर बस में जीपीएस, रीयल-टाइम मॉनिटरिंग, फायर सेफ्टी सिस्टम और तीन महीने में फिटनेस जांच अनिवार्य हो। हर बड़े हादसे की जांच स्वतंत्र एजेंसी से कर रिपोर्ट सार्वजनिक की जाए। यूरोप और अमेरिका में बस अग्निकांड इसलिए दुर्लभ हैं, क्योंकि वहां नियम सिर्फ बनाए नहीं जाते, सख्ती से लागू भी होते हैं।
परिवहन तंत्र का खोखलापन और सामूहिक जवाबदेही
धधकती बस ने फिर साबित कर दिया कि परिवहन तंत्र भीतर से कितना खोखला है। जब तक “कुछ दिन सख्ती, फिर सब सामान्य” वाली सोच नहीं बदलेगी, तब तक मासूम यात्री यूं ही मरते रहेंगे। जवाबदेही केवल ड्राइवर तक सीमित नहीं हो सकती; अधिकारियों से मंत्रियों तक हर जिम्मेदार व्यक्ति कटघरे में हो। सिर्फ आश्वासन नहीं, ऐसी व्यवस्था चाहिए जहां किसी यात्री को जिंदा जलकर न मरना पड़े। वरना अगली बस फिर किसी हाईवे पर जलेगी, लोग फिर खिड़कियां तोड़ेंगे, कोई पिता फिर बच्चे की जली देह उठाएगा और देश फिर सब भूल जाएगा। तब सबसे बड़ा सवाल हादसा नहीं, उसे होने देने वाली हमारी चुप्पी होगी।
