षड़यंत्र का शिकार होती शिक्षा! क्या जानबूझकर ज्ञान से दूर रखा जा रहा है हमारा समाज !
राष्ट्र संवाद
मुंबई (इंद्र यादव) उत्तर प्रदेश बोर्ड की परीक्षाओं से 3,40,760 परीक्षार्थियों का किनारा कर लेना एक ऐसी गूँज है, जिसे सुनकर हर जागरूक नागरिक का दिल बैठ जाना चाहिए। जब एक छात्र अपनी कलम छोड़कर परीक्षा केंद्र से बाहर निकलता है, तो वह केवल एक कागज का टुकड़ा नहीं छोड़ता, बल्कि वह अपने आने वाले कल की उम्मीदों को भी पीछे छोड़ देता है।
क्या यह महज डर है या कोई गहरा षड़यंत्र!
अक्सर कहा जाता है कि सख्ती और नकल विहीन परीक्षा के डर से छात्र परीक्षा छोड़ रहे हैं। लेकिन क्या हमने कभी गहराई से सोचा कि आखिर हमारे नौजवान ‘सख्ती’ से इतने डरे हुए क्यों हैं! क्या यह उन ताकतों का मौन षड़यंत्र तो नहीं, जो चाहते ही नहीं कि गरीब और मध्यम वर्ग का बच्चा शिक्षित होकर अपने अधिकारों के लिए आवाज उठाए!
जब शिक्षा महंगी होती जाती है और गुणवत्ता केवल बड़े शहरों के निजी स्कूलों तक सिमट जाती है, तब गाँव के उस आखिरी पायदान पर खड़े छात्र के पास क्या बचता है! जब बुनियादी सुविधाएं नहीं मिलतीं और छात्र खुद को व्यवस्था की तुलना में कमजोर पाता है, तो वह मैदान छोड़ने पर मजबूर हो जाता है। समाज को शिक्षा से दूर रखने का सबसे बड़ा हथियार ‘हताशा’ है, और आज हमारा युवा इसी हताशा का शिकार हो रहा है।
दांव पर लगा युवाओं का भविष्य !
एक युवा जब पढ़ाई छोड़ता है, तो वह सीधे तौर पर मजदूरी और अनिश्चितता के दलदल में धकेल दिया जाता है। यह 3.4 लाख छात्र केवल संख्या नहीं हैं, बल्कि यह देश की वह ऊर्जा है जो सही दिशा न मिलने के कारण अब भटकने को मजबूर होगी।
सपनों की हत्या: क्या हम एक ऐसे समाज की रचना कर रहे हैं जहाँ शिक्षा केवल एक विशेषाधिकार बनकर रह जाएगी?
आर्थिक बोझ: पढ़ाई छूटने का सीधा मतलब है कम उम्र में श्रम के चक्रव्यूह में फँसना।
मानसिक आघात: परीक्षा छोड़ने का यह बोझ एक छात्र के मन पर ताउम्र एक ‘असफलता’ का ठप्पा बनकर लगा रहता है।
वक्त की पुकार
हमें केवल आंकड़ों पर चर्चा नहीं करनी चाहिए, बल्कि उन कारणों की जड़ तक जाना होगा। क्या हमारे शिक्षकों का जुड़ाव छात्रों से कम हो रहा है! क्या हमारे समाज ने शिक्षा से ज्यादा ‘डिग्री’ को महत्व दे दिया है!
आज जरूरत है कि सरकार, समाज और अभिभावक एक साथ आएं। हमें अपने बच्चों को यह भरोसा दिलाना होगा कि परीक्षा केवल अंकों का खेल नहीं, बल्कि सीखने का एक पड़ाव है। अगर आज हमने इन साढ़े तीन लाख युवाओं के हाथ से गिरती कलम को नहीं थामा, तो कल का इतिहास हमें कभी माफ नहीं करेगा।
“कलम रुकती है तो समझो तरक्की रुक जाती है, शिक्षा छूटती है तो नस्लों की हस्ती मिट जाती है।” – श्री,अजय सीताराम यादव
