देवानंद सिंह
संसद का शीतकालीन सत्र जिस शोर-शराबे और आरोप–प्रत्यारोप के साथ शुरू हुआ था, उसी हताशाजनक अंदाज़ में उसका समापन भी हो गया। लोकतंत्र के मंदिर में नारे गूंजते रहे, तख्तियां लहराती रहीं और सदन बार-बार स्थगित होता रहा। इस शोर के बीच कई जरूरी मुद्दे चर्चा की प्रतीक्षा में ही रह गए। सबसे दुर्भाग्यपूर्ण यह रहा कि दिल्ली-एनसीआर के वायु प्रदूषण जैसे जीवन-मरण के सवाल पर, सत्ता पक्ष और विपक्ष की मौखिक सहमति के बावजूद, कोई ठोस बहस नहीं हो सकी। यह सिर्फ संसदीय असफलता नहीं है, बल्कि करोड़ों नागरिकों के स्वास्थ्य और भविष्य के प्रति हमारी सामूहिक संवेदनहीनता का प्रमाण है।
लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने पिछले सप्ताह वायु प्रदूषण को हेल्थ इमरजेंसी बताते हुए व्यवस्थित और गंभीर चर्चा की मांग की थी। विपक्ष के अन्य नेता भी इस बात पर सहमत थे और सरकार की ओर से भी सकारात्मक संकेत दिए गए थे। लेकिन गुरुवार को, जब इस विषय पर चर्चा की बारी आई, तब मनरेगा की जगह लाए जा रहे ‘विकसित भारत-गारंटी फॉर रोजगार एंड आजीविका मिशन (ग्रामीण)’ को लेकर हुए हंगामे ने सदन की कार्यवाही ही ठप कर दी। नतीजा यह हुआ कि दिल्ली-एनसीआर के दमघोंटू प्रदूषण पर बहस फिर टल गई। अब सरकार यह कहकर पल्ला झाड़ रही है कि वह चर्चा के लिए तैयार थी, जबकि कांग्रेस सवाल उठा रही है कि यदि सहमति थी तो चर्चा क्यों नहीं हो पाई। इस राजनीतिक रस्साकशी के बीच असली सवाल—लोगों की सेहत—फिर पीछे छूट गया।
विडंबना यह है कि जिस समय संसद में यह हंगामा चल रहा था, उसी समय दिल्ली के कई इलाकों में AQI 400 के आसपास था, यानी बेहद गंभीर स्थिति। नवंबर से अब तक राजधानी की हवा लगभग लगातार ज़हरीली बनी हुई है। पिछले महीने 24 दिनों तक AQI 300 के ऊपर रहा और दिसंबर में हालात और बिगड़ गए। जीआरएपी-4 जैसे कड़े प्रतिबंध लागू होने के बावजूद प्रदूषण का स्तर 350 से 400 के बीच बना हुआ है। यह साफ संकेत है कि हमारी मौजूदा रणनीतियां नाकाफी हैं और हम समस्या की जड़ पर नहीं, बल्कि उसके लक्षणों पर ही प्रतिक्रिया दे रहे हैं।
दिल्ली-एनसीआर का प्रदूषण कोई राजनीतिक मुद्दा नहीं है, जिसे दलगत चश्मे से देखा जाए। यह न कांग्रेस का सवाल है, न भाजपा का, न आम आदमी पार्टी का। यह उन करोड़ों लोगों का सवाल है, जो हर सुबह जहरीली हवा में सांस लेने को मजबूर हैं, चाहे वे किसी भी पार्टी को वोट देते हों या किसी भी विचारधारा को मानते हों। वायु प्रदूषण अमीर-गरीब, हिंदू-मुस्लिम, सत्ता-विपक्ष में फर्क नहीं करता। इसका असर सब पर बच्चों के फेफड़ों पर, बुज़ुर्गों के दिल पर, गर्भवती महिलाओं और दिहाड़ी मजदूरों पर बराबर पड़ता है।
सेंटर फॉर रिसर्च ऑन एनर्जी एंड क्लीन एयर का अनुमान बताता है कि केवल साल 2023 में वायु प्रदूषण की वजह से दिल्ली में लगभग 17,200 लोगों की जान चली गई। यह आंकड़ा सड़क हादसों, आपराधिक वारदातों या कई गंभीर बीमारियों से होने वाली मौतों से कहीं अधिक है। दूसरे शब्दों में कहें तो प्रदूषण दिल्ली का सबसे बड़ा मूक हत्यारा बन चुका है, जो बिना किसी सायरन, बिना किसी सुर्खी के, हर दिन लोगों की उम्र घटा रहा है।
इसके बावजूद, हमारी राजनीति में वायु प्रदूषण को आज भी मौसमी समस्या की तरह देखा जाता है, जो हर साल सर्दियों में आती है और कुछ महीनों बाद अपने आप चली जाती है। जैसे ही नवंबर-दिसंबर में स्मॉग छाता है, जीआरएपी लागू होता है, स्कूल बंद होते हैं, निर्माण कार्य रुकते हैं और कुछ दिनों के लिए वाहनों पर रोक लगाई जाती है, लेकिन जैसे ही हवा थोड़ी साफ होती है, हम राहत की सांस लेते हैं और अगले साल तक के लिए समस्या को भुला देते हैं। यह फायरफाइटिंग वाला रवैया न तो वैज्ञानिक है, न ही टिकाऊ।
जीआरएपी यानी ग्रेडेड रिस्पॉन्स एक्शन प्लान, असल में समस्या शुरू हो जाने के बाद उठाया गया कदम है। यह बचाव नहीं, बल्कि नुकसान कम करने की कोशिश भर है। सवाल यह है कि हम उस स्थिति तक पहुंचते ही क्यों हैं, जहां जीआरएपी-4 जैसे आपात कदम उठाने पड़ते हैं? क्यों नहीं पूरे साल चलने वाली, दीर्घकालिक और बहु-आयामी रणनीति बनाई जाती?
दिल्ली-एनसीआर के प्रदूषण के कारण किसी एक कारक तक सीमित नहीं हैं। इसमें वाहनों से निकलने वाला धुआं है, औद्योगिक उत्सर्जन है, निर्माण गतिविधियों से उड़ती धूल है, कचरा और पराली जलाना है, कोयला-आधारित बिजली संयंत्र हैं और साथ ही भौगोलिक व मौसमी कारक भी। इतनी जटिल समस्या का समाधान किसी एक आदेश, किसी एक प्रतिबंध या किसी एक सरकार से संभव नहीं है। इसके लिए पूरे साल का एक्शन प्लान, स्पष्ट गाइडलाइंस, सख्त निगरानी और राज्यों के बीच बेहतर तालमेल जरूरी है।
सबसे बड़ी चुनौती यही है कि दिल्ली-एनसीआर सिर्फ दिल्ली सरकार के अधिकार क्षेत्र तक सीमित नहीं है। इसमें हरियाणा, उत्तर प्रदेश और राजस्थान के कई इलाके शामिल हैं। प्रदूषण की हवा राज्य की सीमाएं नहीं मानती, लेकिन हमारी नीतियां और राजनीति अब भी सीमाओं में बंधी हुई हैं। जब हवा खराब होती है, तो दोषारोपण का खेल शुरू हो जाता है—कभी पराली का ठीकरा पंजाब-हरियाणा पर फोड़ दिया जाता है, कभी उद्योगों के लिए यूपी को जिम्मेदार ठहराया जाता है, तो कभी दिल्ली के वाहनों को मुख्य दोषी बताया जाता है। इस आरोप-प्रत्यारोप में समाधान कहीं खो जाता है।
जरूरत है एक ऐसे संस्थागत ढांचे की, जो एनसीआर के सभी राज्यों को एक साझा मंच पर लाए और जवाबदेही तय करे। सिर्फ बैठकों और घोषणाओं से काम नहीं चलेगा। ठोस लक्ष्य, समयबद्ध योजनाएं और उनके पालन की सख्त व्यवस्था होनी चाहिए। उदाहरण के लिए, सार्वजनिक परिवहन को मजबूत किए बिना निजी वाहनों पर निर्भरता कम नहीं की जा सकती। इलेक्ट्रिक वाहनों को बढ़ावा देने की बात तो बहुत होती है, लेकिन चार्जिंग इंफ्रास्ट्रक्चर, किफायती कीमत और भरोसेमंद सप्लाई चेन के बिना यह सपना अधूरा है।
इसी तरह, निर्माण गतिविधियों पर नियम तो हैं, लेकिन उनका पालन बेहद ढीला है। धूल नियंत्रण के उपाय अक्सर कागज़ों तक सीमित रह जाते हैं। उद्योगों के लिए उत्सर्जन मानक तय हैं, लेकिन निगरानी और दंड की प्रक्रिया कमजोर है। जब तक नियमों के उल्लंघन की कीमत राजनीतिक और आर्थिक रूप से भारी नहीं होगी, तब तक बदलाव की उम्मीद भी कमजोर ही रहेगी।
वायु प्रदूषण से निपटने में जन जागरूकता भी उतनी ही जरूरी है। यह मान लेना कि सारी जिम्मेदारी सरकार की है, समस्या को आधा ही समझना है। नागरिकों की भूमिका भी अहम है, चाहे वह निजी वाहन का कम उपयोग हो, कचरा न जलाना हो, ऊर्जा की बचत हो या पर्यावरण-अनुकूल विकल्पों को अपनाना। लेकिन इसके लिए सरकार को भरोसेमंद जानकारी, पारदर्शी डेटा और निरंतर संवाद के जरिए लोगों को साथ लेना होगा, न कि सिर्फ संकट के समय आदेश थोपने होंगे।
सबसे अहम बात यह है कि वायु प्रदूषण की चुनौती से निपटने के लिए दृढ़ राजनीतिक इच्छाशक्ति चाहिए। इच्छाशक्ति सिर्फ भाषणों या ट्वीट्स से नहीं, बल्कि असहज फैसले लेने से दिखती है, ऐसे फैसले, जो अल्पकाल में अलोकप्रिय हो सकते हैं, लेकिन दीर्घकाल में जनता के हित में हों। क्या हम निजी वाहनों पर सख्त नियंत्रण के लिए तैयार हैं? क्या हम प्रदूषण फैलाने वाले उद्योगों पर कड़ी कार्रवाई का राजनीतिक जोखिम उठा सकते हैं? क्या हम राज्यों के बीच राजनीति से ऊपर उठकर सहयोग कर सकते हैं? ये वही सवाल हैं, जिनके जवाब तय करेंगे कि दिल्ली-एनसीआर का भविष्य सांस लेने लायक होगा या नहीं।
संसद का शीतकालीन सत्र इस मायने में एक चूक हुआ मौका है। जब देश की सबसे बड़ी लोकतांत्रिक संस्था में, सभी दलों की सहमति के बावजूद, वायु प्रदूषण जैसे गंभीर मुद्दे पर चर्चा नहीं हो पाती, तो यह सिर्फ प्रक्रिया की विफलता नहीं, बल्कि प्राथमिकताओं की विफलता भी है। अगर 17,000 से ज्यादा मौतें भी हमें राजनीति से ऊपर उठने के लिए मजबूर नहीं कर सकतीं, तो फिर सवाल उठता है—क्या करेगा?
अब भी वक्त है कि वायु प्रदूषण को मौसमी समस्या या राजनीतिक हथियार के दायरे से बाहर निकालकर एक राष्ट्रीय स्वास्थ्य आपातकाल के रूप में देखा जाए। इसके लिए संसद में गंभीर, तथ्य-आधारित और समाधान-केंद्रित बहस जरूरी है। ऐसी बहस, जो सिर्फ एक सत्र या एक मौसम तक सीमित न रहे, बल्कि पूरे साल की नीति और कार्रवाई का आधार बने। दिल्ली-एनसीआर की हवा सिर्फ आंकड़ों में नहीं, लोगों के फेफड़ों में ज़हर घोल रही है। इसे राजनीति के शोर में दबने नहीं दिया जा सकता।

