देवानंद सिंह
बिहार की राजनीति में आम आदमी पार्टी के बिहार विधान सभा चुनाव में प्रवेश का क्या मतलब है ? क्या उनका वहां ऐसा जनाधार है कि वह विधानसभा की 243 सीटों में से एक पर भी विजय हासिल करने वाली है ? राष्ट्रीय पार्टी बन चुकी है तो फिर जल्दबाजी में आखिर बिहार चुनाव में उतरने का क्यों लिया गया फैसला ? क्या आप के अंदर मची भगदड़ को रोकने के लिए आनन-फानन में बिहार चुनाव में अपने प्रत्याशियों को उतारने का फैसला किया गया ?
ये ऐसे सवाल हैं जिसकी तह में जाएंगे तो आपको खुद ब खुद आभास हो जाएगा कि इस सबके पीछे का असली माजरा क्या है ? यह वही पार्टी जो कहा करती थी कि मजबूत संगठन खड़ा करने के बाद ही किसी प्रदेश में चुनाव में जाएगी । हां, हरियाणा राज्य जरूर अपवाद रहा है जहां मजबूत संगठन नहीं होने के बावजूद चुनाव में उतरी थी आम आदमी पार्टी।
जहां तक बिहार राज्य की बात है तो यहां संगठन खड़ा करने की कवायद पिछले 2020 के विधानसभा चुनाव से पहले ही हो चुकी थी, लेकिन तब यह कहकर 2020 में प्रत्याशियों को नहीं उतारा था कि बिहार भर में संगठन को और मजबूत करने के बाद ही चुनाव में जाया जाएगा। लेकिन 2025 में आखिर ऐसा क्या हो गया कि आनन-फानन में प्रत्याशियों के नामों की घोषणा करनी शुरू कर दी ? यह गौर करने वाली बात है।
सच तो यह है कि बिहार में आम आदमी पार्टी के संगठन के अस्तित्व को बचाने की कवायद के तहत अरविंद केजरीवाल की पार्टी ने पहली लिस्ट जारी की है। कहा जा रहा है कि पीके फैक्टर’ की वजह से आम आदमी पार्टी को चुनावी मैदान में उतरने के लिए मजबूर होना पड़ा है।
बता दें कि राष्ट्रीय जनता दल (RJD) उन दलों में से है जो इंडिया गठबंधन में आम आदमी पार्टी (AAP) के साथ कई राष्ट्रीय मुद्दों पर एक जैसी राय रखते हैं। राजद बिहार में एनडीए को सत्ता से हटाने के लिए इंडिया गठबंधन की अगुवाई कर रही है। इसके बावजूद आम आदमी पार्टी ने पहली बार बिहार विधानसभा चुनाव लड़ने का ऐलान किया है। पार्टी पहले ही 11 उम्मीदवारों की पहली लिस्ट जारी कर चुकी है और कहा जा रहा है कि जल्द ही दूसरी और तीसरी लिस्ट भी आने वाली है। आम आदमी पार्टी के सूत्रों की भी मानें तो पीके फैक्टर यानी प्रशांत किशोर का असर ही आम आदमी पार्टी को बिहार चुनाव में उतरने की असली वजह बना है।
हालांकि बिहार आम आदमी पार्टी के अध्यक्ष राकेश यादव का कहना है कि ये फैसला बिहार के वोटरों को ‘विकल्प वाली राजनीति’ दिखाने के लिए लिया गया है। इसमें दो राय नहीं है कि आम आदमी पार्टी के संगठन महासचिव संदीप पाठक ने पहले घोषणा की थी कि पार्टी बिहार में चुनाव लड़ेगी। लेकिन जब तक उम्मीदवारों की लिस्ट जारी नहीं हुई थी, तब तक इसे लेकर संदेह था।
आम आदमी पार्टी के एक वरिष्ठ नेता ने नाम उजागर नहीं करने की शर्त पर बताया कि प्रशांत किशोर का असर आम आदमी पार्टी के संगठन पर दिखने लगा था। डर था कि पार्टी के स्थानीय नेता और कार्यकर्ता जन सुराज में चले जाएंगे। दरअसल, प्रशांत किशोर का जन सुराज मॉडल राजनीति का वही पैटर्न पेश कर रहा था जो आम आदमी पार्टी का मूल मॉडल यानी जनता से जुड़ी, साफ-सुथरी और मुद्दा आधारित राजनीति है। अब जन सुराज पार्टी एक मजबूत स्थिति में आ चुका है और एक विकल्प भी बन गया है।
पार्टी के वरिष्ठ नेता ने बताया कि आम आदमी पार्टी ने 2020 विधानसभा और 2024 लोकसभा चुनाव नहीं लड़ा। बिहार इकाई लगातार कह रही थी कि अगर पार्टी गोवा, गुजरात, हरियाणा जैसे राज्यों में चुनाव लड़ सकती है तो बिहार को क्यों छोड़ा जाए ? सच तो यह है कि आम आदमी पार्टी बिहार में राजनीतिक रूप से सक्रिय नहीं थी, इसलिए उसके कई नेता और कार्यकर्ता जन सुराज में शामिल हो गए थे। लेकिन अब जब पार्टी ने 2025 चुनाव लड़ने का ऐलान किया तो उम्मीद है कि पार्टी के भीतर भगदड़ कम होगी और जो पुराने वरिष्ठ साथी पार्टी छोड़कर चले गए हैं उन्हें वापस लाने की कोशिश शुरू होगी।
बिहार इकाई आम आदमी पार्टी के अध्यक्ष राकेश यादव का भी साफ मानना है कि जन सुराज का असर पार्टी पर पड़ा था। उन्होंने कहा कि करीब 50% कार्यकर्ता जो जन सुराज में चले गए थे, अब वापसी पर विचार कर रहे हैं। हमने चुनाव नहीं लड़ा इसलिए उन्होंने जन सुराज को विकल्प माना था। अब जब हमने पहली लिस्ट जारी की है तो उत्साह बढ़ गया है। यादव के मुताबिक पार्टी को करीब 6000 आवेदन मिले हैं। स्क्रूटनी चल रही है और जल्द ही दूसरी और तीसरी लिस्ट जारी की जाएगी जिनमें 30-40 उम्मीदवार हो सकते हैं।
पीके से अलग कैसे है उनकी पार्टी की राजनीति इस पर राकेश यादव का कहना है कि पीके के मुताबिक वो बिहार को एक वैकल्पिक राजनीति देंगे लेकिन उनका यह नारा हवा-हवाई जैसा ही है। लोगों ने दिल्ली और पंजाब में आम आदमी पार्टी का गवर्नेंस मॉडल देखा है। स्कूलों और अस्पतालों पर केंद्रित शासन व्यवस्था के जो वादे पीके कर रहे हैं, हम उन्हें पहले ही लागू कर चुके हैं।
हालांकि सच तो यही है कि 2025 के विधानसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी परफार्मेंस कहीं भी दिखाई देता हुआ नहीं दिख रहा है। हां, इससे राजद और आम आदमी पार्टी के रिश्ते पर जरूर असर पड़ता हुआ दिख रहा है। जब राजद ने दिल्ली विधानसभा चुनाव नहीं लड़ा था तो सवाल उठा था कि क्या आम आदमी पार्टी का बिहार चुनाव में उतरना दोनों पार्टियों के रिश्ते पर असर डालेगा? हालांकि आम आदमी पार्टी के विधायक व बिहार प्रभारी संजीव झा इसे नकारते हैं और उनका इस पर तर्क है कि हम हिमाचल प्रदेश में भी चुनाव लड़े थे लेकिन कांग्रेस जीती। इससे हमारे रिश्तों पर कोई असर नहीं पड़ा। हम जहां-जहां चुनाव लड़ रहे हैं वहां अपनी शिक्षा और स्वास्थ्य की राजनीति का मॉडल पेश कर रहे हैं। बिहार में भी हमारी एंट्री असली मुद्दों पर फोकस वापस लाएगी।
वहीं राजनीतिक जानकारों का कहना है कि बिहार में आम आदमी पार्टी चाहे जो भी तर्क़ दे लेकिन इस हकीकत से पीछे नहीं हटा जा सकता है कि पीके फैक्टर ने आम आदमी पार्टी को बिहार की चुनावी रेस में उतरने के लिए मजबूर कर दिया है और इसका फायदा एनडीए गठबंधन को मिलता हुआ दिख रहा है।
एक तरफ सत्ता में होने के कारण लोकलुभावन योजनाओं की घोषणाओं का फायदा मिलने की संभावना जताई जा रही है और उस पर आम आदमी पार्टी का चुनाव में जाने को एनडीए की बी टीम के रूप में देखा जा रहा है। हकीकत भले ही यह ना हो लेकिन जमीनी स्तर पर आम आदमी पार्टी को लेकर बिहार में यही मैसेज है स्थानीय लोगों के बीच। यानी एनडीए को अपनी लोकलुभावन घोषणाओं के साथ साथ आम आदमी पार्टी के चुनाव में उतरने का फायदा होता हुआ दिख रहा है।
कांफिडेंस से भरे एनडीए ने कहना शुरू कर दिया है कि ‘सुशासन बाबू’ की रणनीति की काट नहीं खोज पा रही है इंडिया गठबंधन और परिणामस्वरूप नीतीश कुमार के नेतृत्व में एनडीए एक बार फिर से सत्ता में आने की आशा कर रहा है। इसके लिए नीतीश की रणनीति अपने कोर वोटरों को साथ बनाए रखने की है। यह कोर वोटर है महिलाओं का।
एनडीए को लगता है कि अगर फिर से महिलाओं का साथ मिल गया तो सत्ता की सीढ़ी तक वह फिर पहुंच जाएगा। यही कारण है कि चुनाव से पहले एक करोड़ से अधिक महिलाओं को सरकार ने 10 हजार रुपये की बड़ी रकम एक साथ ट्रांसफर की है। लाखों और महिलाओं के खाते में पैसे जाने अभी बाकी हैं। उधर, तेजस्वी यादव की अगुआई में इंडी ब्लॉक अभी तक इसकी काट नहीं खोज पाया है। लेकिन उसने भी महिलाओं को हर महीने 2,500 रुपये देने का वादा किया है, जो नीतीश के दांव के आगे हल्का लग रहा है।
नीतीश कुमार ने महिलाओं के लिए कई अहम फैसले कर उन्हें अपने पक्ष में रखने की कोशिश की है। दरअसल, 2005 से अब तक महिलाएं और महादलित उनके साइलेंट कोर सपोर्ट रहे हैं। खासकर, महिला वोटर चुनाव में उनके लिए सबसे बड़ा X फैक्टर बनकर उभरती रही हैं।
नीतीश कुमार जब 2005 में सत्ता में आए थे तो उन्हें पता था कि राज्य की राजनीति जातीय समीकरण में उलझी है। इस समीकरण में उनकी जाति का पलड़ा भारी नहीं था। नीतीश की जाति राज्य में बड़ा आधार नहीं रखती थी। इसीलिए उन्होंने महिलाओं और महादलितों-अतिपिछड़ों के बीच पार्टी का विस्तार किया। तब से लेकर अब तक नीतीश की जीत में महिला वोटरों ने अहम भूमिका निभाई है। वह हर बार अपनी पार्टी के घोषणापत्र में महिलाओं के लिए खास वायदे भी करते रहे हैं। चुनाव में हर बार वह निर्णायक भी साबित होता रहा है।
2015 में उन्होंने शराबबंदी और सरकारी नौकरियों में महिलाओं के लिए 35% आरक्षण का वादा किया था। यह दांव सफल रहा। इसकी पुष्टि चुनाव बाद आए सर्वे से हुई। इनमें बताया गया कि 60% से अधिक महिलाओं ने उस चुनाव में नीतीश के पक्ष में वोट किया था। 2009 की जीत में स्कूल जाने वाली लड़कियों को साइकिल देने की घोषणा का अहम रोल था।
इसकी वजह यह भी है कि बिहार में महिलाओं की वोटिंग में शानदार बढ़ोतरी हुई है। 2020 में नीतीश ने ‘जीविका दीदी’ योजना पर फोकस किया, जो उनके लिए ब्रैंड एंबेसडर बनी। हालांकि उनके स्वास्थ्य को लेकर कुछ अफवाएं चल रही हैं उसका थोड़ा बहुत असर दिखाई देता हुआ जरूर दिख रहा है।
लेकिन नीतीश कुमार के करीबी रणनीतिकारों का दावा है कि हर बार चुनाव से पहले उनके बारे में नकारात्मक बातें होती हैं, लेकिन जब नतीजे आते हैं तो सभी हैरान हो जाते हैं। इन रणनीतिकारों का दावा है कि साइलेंट वोटर इस बार भी उनके साथ जुड़े रहेंगे। 2020 में भी जब तमाम सर्वे उनके खिलाफ बताए जा रहे थे, तब अंतिम परिणाम में इन्हीं महिलाओं ने नीतीश का किला किस तरह बचा दिया था यह सबके सामने है।
लेकिन इंडी गठबंधन भी चुप नहीं बैठा है और तेजस्वी यादव के नेतृत्व में नीतीश कुमार के इस मजबूत किले में माई-बहिन योजना की बदौलत सेंध लगाने की कोशिश कर रहे हैं। वे हर महिला को 2,500 रुपये देने का वादा कर रहे हैं। वह नीतीश सरकार के महिलाओं के खाते में 10 हजार ट्रांसफर किए जाने की योजना को काउंटर करने के लिए वादा कर रहे हैं कि सत्ता में आए तो 2,500 रुपये की योजना को लागू करने के साथ ही हर महिला के खाते में पूरे साल का एकमुश्त 30 हजार रुपया एडवांस दे देंगे।
इंडिया गठबंधन महिला वोटरों का डेटा बनाकर उन तक पहुंचने की कोशिश कर रहा है। इसका गणित है कि अगर इसमें कुछ हद तक भी सेंध लगाने में सफलता मिल गई तो सियासी संतुलन उसके पक्ष में आ जाएगा। मगर सवाल यह है कि क्या विपक्षी गठबंधन नीतीश के कोर वोटरों के किले में सेंध लगा पाएगा ? अगर ऐसा करने में इंडी गठबंधन सफल हुआ तो उसका असर विधानसभा चुनाव परिणाम पर भी पड़ेगा, इसे नकारा नहीं जा सकता है। इंतजार रहेगा काउंटिंग वाले दिन का जिस दिन नेताओं के दावों की सच्चाई सामने आ जाएगी।

