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    79वें स्वतंत्रता दिवस पर प्रधानमंत्री मोदी द्वारा दिए गए संबोधन के मायने

    News DeskBy News DeskAugust 18, 2025No Comments6 Mins Read
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    कालियाचक घटना
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    79वें स्वतंत्रता दिवस पर प्रधानमंत्री मोदी द्वारा दिए गए संबोधन के मायने
    देवानंद सिंह
    शुक्रवार को भारत ने अपना 79वां स्वतंत्रता दिवस पूरे हर्षोल्लास के साथ मनाया। यह महापर्व केवल एक तिथि नहीं, बल्कि स्वतंत्रता संग्राम की अनगिनत कुर्बानियों और राष्ट्रनिर्माण के अथक प्रयासों की सजीव अभिव्यक्ति है। इस ऐतिहासिक अवसर पर प्रधानमंत्री नरेन्‍द्र मोदी ने लालकिले की प्राचीर से राष्ट्र को संबोधित करते हुए देश की 140 करोड़ जनता को एकजुटता, गर्व और उन्नति की भावना से ओतप्रोत किया। उनके भाषण का केंद्रबिंदु था, देश की आंतरिक सुरक्षा, संविधान के प्रति आस्था और उन क्षेत्रों की सफलता कहानी, जो कभी भारत के लिए चुनौती थे।

     


    प्रधानमंत्री ने जहां एक ओर ‘हर घर तिरंगा’ जैसे अभियानों की सफलता को देश के बढ़ते राष्ट्रीय चेतना का प्रतीक बताया, वहीं दूसरी ओर उन्होंने नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में हुई असाधारण प्रगति पर विशेष ध्यान दिया। उनका यह वक्तव्य, विशेषकर बस्तर और कोंडागांव जिलों को नक्सल प्रभावित जिलों की सूची से बाहर किए जाने का संदर्भ, भारत के सुरक्षा और विकास नीति के नए युग का संकेत है।
    प्रधानमंत्री मोदी ने स्वतंत्रता दिवस के अवसर को 140 करोड़ भारतीयों का महापर्व बताया। उन्होंने कहा कि यह पर्व केवल सरकार या किसी एक संस्था का नहीं, बल्कि हर नागरिक की सामूहिक उपलब्धियों और आकांक्षाओं का उत्सव है। देश में जो एकता की भावना विकसित हुई है, वह भारतीय लोकतंत्र की सबसे बड़ी शक्ति है। भारत का जो संविधान डॉ. राजेंद्र प्रसाद, डॉ. भीमराव आंबेडकर, पंडित नेहरू, सरदार वल्लभभाई पटेल, डॉ. राधाकृष्णन और कत्यानी जैसी महिलाओं की दूरदृष्टि का परिणाम है, आज भी हमें दिशा दिखा रहा है।
    इस भाषण में संविधान के प्रति प्रधानमंत्री की प्रतिबद्धता स्पष्ट रूप से दिखाई दी। उन्होंने यह स्वीकार किया कि लोकतंत्र केवल वोट देने की प्रक्रिया नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय, समान अवसर और सतत विकास की ओर बढ़ने का एक सशक्त माध्यम है। यही संवैधानिक ढांचा देश के कोने-कोने तक कानून, अधिकार और विकास के संदेश को पहुंचा रहा है।

     

     


    प्रधानमंत्री ने नक्सलवाद की समस्या पर विस्तार से चर्चा की और बताया कि एक समय था, जब देश के 125 जिले नक्सलवाद से प्रभावित थे, आज यह संख्या घटकर केवल 20 जिलों तक सीमित रह गई है। यह बदलाव कोई संयोग नहीं, बल्कि केंद्र और राज्य सरकारों की रणनीतिक सोच, सुरक्षा बलों के समर्पण और जनता की भागीदारी का प्रत्यक्ष परिणाम है।
    विशेष रूप से, बस्तर और कोंडागांव जिलों का उल्लेख करते हुए प्रधानमंत्री ने बताया कि ये वे क्षेत्र थे, जिन्हें कभी रेड कॉरिडोर के नाम से जाना जाता था। यहां माओवादी हिंसा, असुरक्षा और सरकारी तंत्र से अविश्वास का बोलबाला था, लेकिन आज ये क्षेत्र ग्रीन कॉरिडोर बन चुके हैं, यानी विकास, शांति और अवसरों के प्रतीक। यह शब्दावली ही अपने आप में दर्शाती है कि भारत ने अपने सबसे बड़े आंतरिक सुरक्षा संकटों में से एक पर किस हद तक नियंत्रण पा लिया है।
    केंद्र सरकार द्वारा हाल ही में बस्तर और कोंडागांव को नक्सल प्रभावित जिलों की सूची से हटाया जाना केवल प्रशासनिक निर्णय नहीं, बल्कि एक ऐतिहासिक मोड़ है। बस्तर, जो दो दशक से भी अधिक समय तक माओवादी उग्रवाद का गढ़ रहा, आज शांति की राह पर है। 2023 के विधानसभा चुनावों में बस्तर में 84.6% और कोंडागांव में 81.7% मतदान दर दर्ज की गई, यह न केवल लोकतांत्रिक सहभागिता का प्रमाण है, बल्कि जनता के भरोसे और सुरक्षा की भावना का भी प्रतीक है।

     


    इन जिलों में हिंसा की घटनाओं में उल्लेखनीय गिरावट आई है। उदाहरण के लिए, कोंडागांव में पिछले पांच वर्षों में केवल एक ही मुठभेड़ की घटना दर्ज की गई, जब 16 अप्रैल को दो वरिष्ठ माओवादी कमांडरों को सुरक्षा बलों ने मार गिराया, इससे यह स्पष्ट होता है कि माओवादी गतिविधियों की जड़ें कमजोर हो चुकी हैं, और सरकार का सुरक्षा तंत्र अधिक संगठित, पेशेवर और जनोन्मुख हो चुका है।
    प्रधानमंत्री ने गर्व के साथ यह बताया कि जो क्षेत्र कभी लाल आतंक से ग्रस्त थे, वहां अब विकास की धारा बह रही है। माओवादियों द्वारा कभी लाल रंग में रंगे गए इलाकों में अब भारत का तिरंगा फहराया जा रहा है, यह केवल प्रतीकात्मक बदलाव नहीं, बल्कि शासन की वैधता और संवैधानिक व्यवस्था की पुनर्स्थापना का सूचक है।
    बस्तर और आसपास के क्षेत्रों में अब आधारभूत संरचनाओं का तेजी से विकास हो रहा है। सड़कों, स्कूलों, अस्पतालों, बिजली, जल और डिजिटल कनेक्टिविटी जैसे क्षेत्रों में अभूतपूर्व प्रगति दर्ज की जा रही है। सरकार की ‘सबका साथ, सबका विकास’ की नीति अब इन क्षेत्रों में साकार हो रही है, जो दशकों तक उपेक्षा और अलगाव का शिकार रहे।
    इसके अतिरिक्त, युवा वर्ग में खेलों के प्रति जागरूकता और सहभागिता बढ़ी है। प्रधानमंत्री ने विशेष रूप से यह उल्लेख किया कि बस्तर जैसे क्षेत्र से अब युवा ओलंपिक में भाग लेने के लिए आगे आ रहे हैं। यह सामाजिक बदलाव इस बात का प्रमाण है कि जब समाज को अवसर मिलता है, तो वह हिंसा से दूर रहकर अपने जीवन को सकारात्मक दिशा में ले जा सकता है।
    नक्सलवाद केवल एक सुरक्षा चुनौती नहीं, बल्कि सामाजिक, आर्थिक और प्रशासनिक विफलताओं का परिणाम था। दशकों तक विकास से कटे हुए इन क्षेत्रों में जनविश्वास का अभाव था, परंतु अब जब सरकार ने शिक्षा, स्वास्थ्य, रोज़गार और आधारभूत सुविधाओं पर ध्यान केंद्रित किया है, तब जाकर वहां के लोग मुख्यधारा से जुड़ने लगे हैं।

     


    ग्राम पंचायतों को सशक्त बनाना, आदिवासी संस्कृति का सम्मान, स्थानीय युवाओं की भर्ती, और संवाद की प्रक्रिया को मजबूत करना, इन सभी प्रयासों ने मिलकर वह माहौल बनाया है, जिसमें नक्सलवाद अब अप्रासंगिक होता जा रहा है। यह केवल बंदूक से नहीं, बल्कि विश्वास के साथ जीते गए युद्ध की कहानी है।
    बस्तर और कोंडागांव की कहानी भारत की आंतरिक सुरक्षा नीति में निर्णायक बदलाव का संकेत देती है। यह बदलाव केवल सुरक्षात्मक दृष्टिकोण से नहीं, बल्कि विकास-केंद्रित और मानवोन्मुख रणनीति का परिणाम है। जब तक राजनीतिक इच्छाशक्ति दृढ़ न हो, तब तक कोई भी नीति जमीन पर नहीं उतर सकती। प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में भारत सरकार ने यह दिखाया है कि जब संकल्प दृढ़ हो और रणनीति समावेशी हो, तो सबसे कठिन चुनौतियों को भी पार किया जा सकता है।
    कुल मिलाकर,‍79वें स्वतंत्रता दिवस के इस अवसर पर भारत ने केवल अपने अतीत को स्मरण नहीं किया, बल्कि भविष्य की ओर आशा भरी दृष्टि से देखा। प्रधानमंत्री मोदी का भाषण केवल शब्दों का पुलिंदा नहीं, बल्कि उस भारत की झलक था, जो हिंसा, अविश्वास और अलगाव से ऊपर उठकर शांति, समरसता और समृद्धि की राह पर बढ़ रहा है।

     


    बस्तर और कोंडागांव की कहानी इस बात की मिसाल है कि जब सरकार, समाज और सुरक्षा बल मिलकर कार्य करें, तो परिवर्तन अनिवार्य होता है। ये वे क्षेत्र हैं, जो कभी देश की चिंता थे, अब वे गर्व का कारण बन गए हैं। आज जब हम स्वतंत्रता का अमृतकाल मना रहे हैं, तो यह आवश्यक है कि इस नए भारत की भावना एकता, विकास और जनसशक्तिकरण को अपने जीवन में उतारें। यह केवल बस्तर की जीत नहीं, यह भारत की जीत है। यह तिरंगे की जीत है।

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