भारत-कनाडा संबंधों की नई पहल
देवानंद सिंह
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का 2025 में कनाडा दौरा केवल एक शिखर सम्मेलन में भागीदारी भर नहीं था, बल्कि यह एक लंबे समय से जमी हुई बर्फ को पिघलाने की कोशिश थी। दस वर्षों के अंतराल के बाद कनाडा की धरती पर कदम रखते हुए प्रधानमंत्री मोदी ने संकेत दिया कि भारत अब एक कठिन मगर, आवश्यक कूटनीतिक संवाद के लिए तैयार है, विशेष रूप से ऐसे समय में जब भारत-कनाडा संबंधों की नींव ही डगमगाने लगी थी।

इस दौरे की प्रासंगिकता और गहराई केवल जी-7 सम्मेलन तक सीमित नहीं थी। यह यात्रा, हरदीप सिंह निज्जर की हत्या के बाद उत्पन्न तनावों के बीच दोनों देशों के नेताओं नरेंद्र मोदी और नए कनाडाई प्रधानमंत्री मार्क कार्नी की पहली औपचारिक बैठक का मंच भी बनी। इस मुलाकात ने एक लंबे गतिरोध के बाद संभावनाओं की नई खिड़की खोली है, हालांकि यह कहना जल्दबाज़ी होगी कि आपसी विश्वास पूरी तरह बहाल हो चुका है।

भारत और कनाडा के बीच वर्तमान संकट की जड़ें जून 2023 की उस घटना में हैं, जब खालिस्तान समर्थक हरदीप सिंह निज्जर की सरे, ब्रिटिश कोलंबिया में गोली मारकर हत्या कर दी गई थी। भारत सरकार द्वारा ‘आतंकवादी’ घोषित किए जा चुके निज्जर की हत्या के बाद कनाडा के तत्कालीन प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रूडो ने संसद में यह आरोप लगाया कि हत्या में भारत सरकार के एजेंटों की संलिप्तता हो सकती है। यह एक अप्रत्याशित और अभूतपूर्व आरोप था, जिसने भारत-कनाडा संबंधों को एक नए निम्न स्तर पर पहुंचा दिया। भारत ने इन आरोपों को पूरी तरह से निराधार करार देते हुए न केवल कड़ा विरोध दर्ज कराया, बल्कि कनाडा से सबूत पेश करने की मांग की। जब कनाडा की रॉयल माउंटेड पुलिस ने भारत पर कनाडा की धरती पर हिंसा फैलाने का आरोप लगाया, तो भारत ने जवाबी कार्रवाई करते हुए न केवल अपने उच्चायुक्त को वापस बुलाया, बल्कि कनाडा के छह राजनयिकों को निष्कासित भी किया।

ऐसे वातावरण में जब पारस्परिक अविश्वास अपने चरम पर था, प्रधानमंत्री मोदी और प्रधानमंत्री कार्नी की कैनेनास्किस में हुई मुलाकात को निर्णायक क्षण माना जा सकता है। यह बैठक जी-7 सम्मेलन के इतर हुई, लेकिन इसका महत्व किसी द्विपक्षीय वार्ता से कम नहीं था। पीएम मोदी ने इस मुलाकात को सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म ‘एक्स’ पर साझा करते हुए लिखा, “मैं और पीएम कार्नी भारत-कनाडा संबंधों को गति देने के लिए काम कर रहे हैं।” यह एक छोटा-सा वाक्य था, लेकिन इसके पीछे कूटनीतिक मंशा और यथार्थ की गूंज स्पष्ट सुनाई देती है।

प्रधानमंत्री कार्नी के बयान में यह पुष्टि की गई कि दोनों देश अपने-अपने उच्चायुक्तों की नियुक्ति बहाल करने पर सहमत हुए हैं। यह पहला ठोस संकेत था कि दोनों सरकारें कम से कम संवाद की बहाली के लिए तैयार हैं। उनका यह बयान भी उल्लेखनीय रहा कि नेताओं ने आपसी सम्मान, क़ानून के शासन, संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता के सिद्धांतों पर आधारित भारत–कनाडा संबंधों के महत्व की पुष्टि की।

भारत और कनाडा द्वारा अपने उच्चायुक्तों की बहाली पर सहमति जताना केवल प्रतीकात्मक नहीं, बल्कि रणनीतिक महत्व का भी कदम है। राजनयिक संवाद की बहाली, व्यापारिक सहयोग और प्रवासी भारतीयों की स्थिरता के लिहाज़ से आवश्यक थी। विदेश सचिव विक्रम मिसरी द्वारा दिया गया बयान इस दिशा में एक स्पष्ट संकेत है। उनके अनुसार, प्रधानमंत्रियों ने इस महत्वपूर्ण रिश्ते में स्थिरता बहाल करने के लिए सोच-समझकर क़दम उठाने पर सहमति जताई। पहला क़दम उच्चायुक्तों की शीघ्र नियुक्ति रहेगा। अन्य कूटनीतिक क़दम भी समय पर उठाए जाएंगे।

यहां सवाल यह भी उठता है कि क्या कनाडा की नई सरकार, जो ट्रूडो की अपेक्षा अपेक्षाकृत व्यावहारिक और संतुलित रुख अपना रही है, भारत के साथ रिश्तों में पूर्व की तुलना में ज़्यादा गंभीर है? और क्या भारत भी इस रिश्ते को खालिस्तान मुद्दे से परे देखना चाह रहा है?
इस मुलाक़ात के बाद कनाडा के प्रधानमंत्री कार्नी से जब हरदीप सिंह निज्जर की हत्या पर सीधा सवाल किया गया, तो उन्होंने कूटनीतिक संयम का परिचय देते हुए कहा, हमने क़ानून के स्तर पर संवाद किया, और सहयोग के महत्व पर चर्चा की। इस मामले में न्यायिक प्रक्रिया चल रही है और मुझे आगे कोई टिप्पणी करते समय सावधानी बरतनी होगी, जो बयान स्पष्ट करता है कि निज्जर मुद्दा अभी भी संबंधों की एक ठोस बाधा बना हुआ है। ट्रूडो द्वारा लगाए गए आरोपों को खुलेआम तो नहीं दोहराया गया, लेकिन उन्हें पूरी तरह से खारिज भी नहीं किया गया। इस ‘न सिरे से नकारना, न स्वीकारना’ की रणनीति को एक तरह की राजनयिक चतुराई भी कहा जा सकता है या फिर, भविष्य के लिए दरवाज़ा खुला रखने की विवशता।
भारत लगातार यह आरोप लगाता रहा है कि कनाडा में बैठे कुछ खालिस्तान समर्थक समूह खुलेआम भारत-विरोधी गतिविधियों में लिप्त हैं, जिनमें हिंसा की योजनाएं भी शामिल हैं। कनाडा, दूसरी ओर, इन गतिविधियों को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के दायरे में मानता है, जो उसके संविधान का मूलभूत तत्व है।
यह टकराव केवल दो देशों के बीच विचारधारात्मक असहमति नहीं, बल्कि राजनैतिक संस्कृति और संवैधानिक मूल्यों की भिन्नता को भी दर्शाता है। भारत के लिए खालिस्तानी गतिविधियां आतंकवाद का चेहरा हैं, वहीं कनाडा के लिए वे बहुधा राजनीतिक असहमति का प्रतीक हैं। भारत द्वारा कनाडा पर यह दबाव बनाना कि वह ‘वांटेड’ व्यक्तियों को सौंपे, बार-बार टकराव की वजह बनता रहा है, लेकिन इन टकरावों को न सुलझाना न केवल दोनों देशों की सुरक्षा के लिहाज़ से ख़तरनाक है, बल्कि इससे द्विपक्षीय व्यापार, प्रवासी भारतीयों की स्थिति और वैश्विक मंचों पर सहयोग की संभावना भी प्रभावित होती है। प्रधानमंत्री मोदी और प्रधानमंत्री कार्नी की मुलाकात ने एक ठहरा हुआ संवाद फिर से शुरू किया है, लेकिन यह अभी शुरुआत भर है। रिश्तों में जो खटास पिछले एक वर्ष में उत्पन्न हुई है, उसका समाधान केवल उच्चायुक्तों की बहाली से नहीं होगा।
भारत और कनाडा को चाहिए कि वे सिर्फ उच्चायुक्त नहीं, बल्कि मंत्रिस्तरीय और नौकरशाही स्तर पर भी संवाद फिर से शुरू होना चाहिए। दूसरा, कनाडा में बसे भारतीयों, विशेषकर सिख समुदाय को दो देशों की राजनीतिक खींचतान का शिकार बनने से रोका जाना चाहिए। कनाडा को यह स्पष्ट करना होगा कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की आड़ में आतंकवाद को जगह नहीं दी जा सकती। यदि, दोनों देश एक पारदर्शी और समन्वित जांच तंत्र स्थापित करते हैं, तो विवादास्पद मुद्दों पर विश्वास बहाली हो सकती है।
कुल मिलाकर, भारत और कनाडा के रिश्ते एक ऐसे चौराहे पर खड़े हैं, जहां से या तो नए सहयोग की राह खुल सकती है या फिर पुरानी रंजिशों का दोहराव। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मार्क कार्नी की भेंट इस दिशा में एक सकारात्मक पहल है, लेकिन इसकी सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि आने वाले महीनों में यह संवाद किस दिशा में आगे बढ़ता है। भारत के लिए यह आवश्यक है कि वह खालिस्तान समर्थकों के खिलाफ अपनी सुरक्षा चिंताओं को अंतरराष्ट्रीय मंच पर लगातार स्पष्ट करता रहे, वहीं कनाडा को भी यह समझना होगा कि लोकतंत्र की रक्षा का अर्थ आतंकवादी गतिविधियों की अनदेखी नहीं हो सकता। यह समय है संवाद का, संतुलन का और साझा ज़िम्मेदारी का। वरना निज्जर विवाद जैसी घटनाएं केवल द्विपक्षीय संबंधों को ही नहीं, वैश्विक राजनीति में भारत की छवि को भी प्रभावित करती रहेंगी। प्रधानमंत्री मोदी की कनाडा यात्रा अगर इस दिशा में एक ठोस शुरुआत है, तो यह स्वागतयोग्य है, लेकिन भविष्य की स्थिरता केवल भाषणों और फोटो अवसरों से नहीं, ठोस कूटनीतिक कदमों से आएगी।


