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    Home » जनगणना 2027 कई मायनों में होगी ऐतिहासिक और निर्णायक
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    जनगणना 2027 कई मायनों में होगी ऐतिहासिक और निर्णायक

    News DeskBy News DeskJune 18, 2025No Comments6 Mins Read
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    जनगणना 2027 कई मायनों में होगी ऐतिहासिक और निर्णायक
    देवानंद सिंह

    16 वर्षों की लंबी प्रतीक्षा के बाद भारत एक बार फिर से जनगणना की दहलीज़ पर खड़ा है। केंद्र सरकार द्वारा  जारी अधिसूचना के अनुसार, वर्ष 2027 में देश की जनगणना दो चरणों में संपन्न कराई जाएगी। यह जनगणना कई मायनों में ऐतिहासिक और निर्णायक होगी क्योंकि इसमें पहली बार 1931 के बाद जातिगत आंकड़ों को भी संग्रहीत किया जाएगा। यह सिर्फ एक जनगणना नहीं, बल्कि भारत के सामाजिक, राजनीतिक और नीतिगत भविष्य की दिशा तय करने वाला एक महत्त्वपूर्ण कदम है।

     

    केंद्र सरकार द्वारा अधिसूचित कार्यक्रम के अनुसार देश के अधिकांश भागों में 1 मार्च 2027 की मध्यरात्रि को जनगणना की आधार तारीख माना जाएगा, जबकि ठंडे और दुर्गम क्षेत्रों जैसे लद्दाख, जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड में यह प्रक्रिया पहले चरण में 1 अक्तूबर 2026 को शुरू होगी। यह रणनीति जलवायु परिस्थितियों के अनुकूल निर्णय की ओर संकेत करती है।

     


    एक और उल्लेखनीय पहल यह है कि 2027 की जनगणना पहली बार पूर्णतः डिजिटल माध्यम से कराई जाएगी। इससे आंकड़ों की सटीकता और प्रक्रिया की पारदर्शिता में उल्लेखनीय सुधार की उम्मीद की जा सकती है। हालांकि, यह देखना शेष रहेगा कि देश के सुदूर और डिजिटल रूप से पिछड़े क्षेत्रों में सरकार यह तकनीकी रूपांतरण किस दक्षता से लागू करती है।

    उल्लेखनीय है कि ब्रिटिश काल की 1931 की जनगणना अंतिम बार थी,  जिसमें भारत की जातिगत संरचना को व्यापक रूप से दर्ज किया गया था। आज़ादी के बाद से लेकर अब तक सिर्फ अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति से संबंधित आंकड़े ही संकलित किए जाते रहे हैं, जबकि अन्य पिछड़ी और सामान्य जातियों की गणना से परहेज़ किया गया, लेकिन अब केंद्र सरकार ने ऐतिहासिक कदम उठाते हुए यह तय किया है कि 2027 की जनगणना में हर नागरिक को अपनी जाति बताने का विकल्प दिया जाएगा। यह परिवर्तन केवल डेटा संग्रह का मामला नहीं है, बल्कि इससे भारत की सामाजिक संरचना, संसाधनों के वितरण और कल्याणकारी योजनाओं के स्वरूप पर व्यापक असर पड़ेगा।

     

     

    जातिगत जनगणना की मांग पिछले कई वर्षों से विपक्षी दलों, विशेषकर क्षेत्रीय दलों द्वारा जोर-शोर से उठाई जाती रही है। बिहार, उत्तर प्रदेश, तमिलनाडु, महाराष्ट्र और झारखंड जैसे राज्यों की सरकारें पहले ही राज्य स्तरीय जातिगत सर्वेक्षण करा चुकी हैं या कराने की प्रक्रिया में हैं। ऐसे में, केंद्र सरकार का यह निर्णय निश्चित ही एक महत्वपूर्ण राजनीतिक संतुलन साधने का प्रयास है। विश्लेषकों का मानना है कि जातिगत आंकड़ों के आधार पर सामाजिक न्याय की योजनाओं को ज़मीनी स्तर पर अधिक सटीकता से लागू किया जा सकेगा। इससे सामाजिक असमानता को कम करने और ‘सबका साथ, सबका विकास’ की अवधारणा को मूर्त रूप देने में सहायता मिल सकती है।

     

     

    जनगणना के सबसे दूरगामी प्रभावों में से एक परिसीमन की प्रक्रिया है। संविधान के अनुसार, हर जनगणना के बाद लोकसभा और राज्य विधानसभा की सीटों का परिसीमन किया जाना चाहिए। हालांकि, 1976 के बाद इस प्रक्रिया पर अस्थायी रोक लगा दी गई थी। कारण स्पष्ट था—जनसंख्या नियंत्रण की दिशा में दक्षिण भारत के राज्यों ने उल्लेखनीय प्रगति की थी, जबकि उत्तर भारत में जनसंख्या वृद्धि तेज़ी से जारी रही। इस असंतुलन के चलते यदि नए परिसीमन की प्रक्रिया शुरू होती, तो दक्षिण भारत की संसदीय हिस्सेदारी में गिरावट आती, जो राजनीतिक रूप से अस्वीकार्य थी।

     

     

    1976 में यह निर्णय लिया गया कि अगला परिसीमन 2001 की जनगणना के आधार पर होगा, लेकिन एक और स्थगन के बाद अब 2027 की जनगणना को आधार मानकर परिसीमन की संभावना प्रबल हो गई है। चूंकि महिला आरक्षण कानून के अनुसार महिलाओं के लिए 33% सीटों का आरक्षण अगली जनगणना के आधार पर ही लागू किया जाएगा, अतः इस बार की जनगणना न केवल सामाजिक और आर्थिक योजनाओं, बल्कि संसदीय प्रतिनिधित्व के स्वरूप को भी प्रभावित करेगी।
    विशेषज्ञ कहते हैं कि 1976 में भी परिसीमन को लेकर उत्तर और दक्षिण भारत के राज्यों में टकराव की स्थिति उत्पन्न हुई थी। दक्षिण के राज्यों ने जनसंख्या नियंत्रण को प्राथमिकता दी और इसके लिए नीतिगत प्रतिबद्धता दिखाई, लेकिन यदि जनसंख्या ही संसदीय प्रतिनिधित्व का एकमात्र आधार बन जाए, तो इन राज्यों को राजनीतिक रूप से नुकसान उठाना पड़ सकता है।

     

    इस संदर्भ में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की यह टिप्पणी उल्लेखनीय है कि परिसीमन प्रक्रिया में दक्षिणी राज्यों की चिंताओं का पूरा ध्यान रखा जाएगा। गृह मंत्री का यह आश्वासन भले ही राजनीतिक दृष्टिकोण से उपयुक्त हो, लेकिन यह संघीय ढांचे और राष्ट्रीय एकता की जटिलताओं को भी उजागर करता है। वर्ष 2021-22 में जनगणना के लिए 3,768 करोड़ रुपये आवंटित किए गए थे, लेकिन हालिया बजट (2025-26) में यह राशि घटाकर मात्र 574.80 करोड़ रुपये कर दी गई। सरकार का यह तर्क कि बजट कभी बाधा नहीं रहा, वास्तविकता में जनगणना को लेकर नीति-निर्माताओं की प्राथमिकताओं पर सवाल खड़ा करता है।

     

     

    जब एक इतनी महत्त्वपूर्ण प्रक्रिया, जो नीतिगत निर्णयों और संसाधन आवंटन का आधार बनती है, उसके लिए बजटीय कटौती की जाए, तो यह प्रशासनिक इच्छाशक्ति पर एक संकेत हो सकता है, हालांकि डिजिटल जनगणना अपेक्षाकृत कम लागत की हो सकती है, लेकिन इसकी व्यापकता और तकनीकी दक्षता सुनिश्चित करना चुनौतीपूर्ण होगा। जनगणना 2027 भारत के लिए एक ऐसा ऐतिहासिक मोड़ साबित हो सकती है, जहां से सामाजिक संरचना, राजनीतिक प्रतिनिधित्व और सार्वजनिक नीतियों की नई परिभाषा गढ़ी जाएगी। जातिगत गणना के माध्यम से सामाजिक न्याय को और अधिक सटीकता से परिभाषित किया जा सकेगा, वहीं डिजिटल प्रक्रिया से पारदर्शिता और समयबद्धता को बढ़ावा मिलेगा।

    हालांकि, यह भी स्पष्ट है कि इस प्रक्रिया में राजनीतिक, सामाजिक और प्रशासनिक स्तर पर कई अंतर्विरोध उभरेंगे। दक्षिण भारत की चिंता, उत्तर भारत की जनसंख्या वृद्धि, महिला आरक्षण का कार्यान्वयन, और सीमित बजटीय आवंटन जैसे पहलू इस जनगणना को मात्र एक प्रशासनिक कवायद न बनाकर उसे देश के भविष्य की सामाजिक-सांविधानिक दिशा तय करने वाला महत्वपूर्ण पड़ाव बना देंगे। यदि, सरकार पारदर्शिता, सहभागिता और निष्पक्षता के सिद्धांतों पर अमल करते हुए इस प्रक्रिया को अंजाम देती है, तो यह जनगणना भारत के लोकतंत्र को और अधिक समावेशी और संतुलित बनाने की दिशा में एक क्रांतिकारी कदम साबित हो सकती है।

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