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    धार्मिक और सांस्कृतिक मामलों को राजनीति से ऊपर उठकर समझने की जरूरत

    News DeskBy News DeskMarch 20, 2025No Comments4 Mins Read
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    धार्मिक और सांस्कृतिक मामलों को राजनीति से ऊपर उठकर समझने की जरूरत
    देवानंद सिंह
    हाल ही में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक श्री मोहन भागवत द्वारा मंदिरों के विषय में दिए गए वक्तव्य ने मीडिया और राजनीतिक जगत में एक नए घमासान को जन्म दिया है, हालांकि यह घमासान प्रायः जान-बूझकर ही पैदा किया गया प्रतीत होता है, लेकिन इस घटना के पीछे एक गहरी सामाजिक और सांस्कृतिक दृष्टि भी छिपी हुई है। भागवत ने मंदिरों के महत्व को केवल धार्मिक दृष्टिकोण से नहीं, बल्कि समाज और इतिहास के संदर्भ में भी समझाने की कोशिश की। उनका यह बयान समाज से विवेकशील दृष्टिकोण अपनाने का आह्वान करता है, ताकि मंदिरों का मुद्दा राजनीति से ऊपर उठकर और संवेदनशीलता के साथ समझा जा सके।

    भारत एक प्राचीन और समृद्ध सभ्यता का घर है, जो सहस्रों वर्षों से विविधता में एकता के सिद्धांत को न केवल सिखाता है, बल्कि उसे जीता और आत्मसात भी करता है। यहां के मंदिर केवल पूजा स्थल नहीं हैं, बल्कि हमारी सभ्यता और संस्कृति के संवाहक हैं। प्रत्येक मंदिर एक जीवित इतिहास है, जो भारतीय समाज की धार्मिक, सामाजिक और सांस्कृतिक धारा को प्रकट करता है। यही कारण है कि भारत में मंदिरों का महत्व केवल आध्यात्मिक नहीं, बल्कि ऐतिहासिक और सांस्कृतिक भी है।

    भारत के हर कोने में ऐसे ऐतिहासिक मंदिर स्थित हैं, जो अनेक आक्रांताओं के हमलों से बचते हुए भी अपनी पहचान बनाए हुए हैं। इन मंदिरों में सिर्फ धार्मिक पूजा-अर्चना नहीं होती, बल्कि ये उस समय के सांस्कृतिक और ऐतिहासिक संदर्भों को भी जीवित रखते हैं। ये मंदिर एक जीवंत संग्रहालय की तरह हैं, जो हमें हमारी जड़ों से जोड़े रखते हैं। जब हम इन मंदिरों में जाते हैं, तो हम केवल देवताओं की पूजा नहीं करते, बल्कि उस इतिहास और संस्कृति को भी सम्मानित करते हैं जो हमारे पूर्वजों ने संघर्षों के बावजूद बनाए रखी, लेकिन यहां एक महत्वपूर्ण प्रश्न उठता है कि क्या मंदिरों को सिर्फ धार्मिक स्थल के रूप में देखा जाए, या फिर राजनीतिक स्वार्थों की साधना का माध्यम बना दिया जाए? दुर्भाग्यवश, कुछ राजनीतिक दल और नेता मंदिरों को राजनीतिक फायदे के लिए इस्तेमाल करने की कोशिश करते हैं। वे मंदिरों की “खोज” को सनसनीखेज तरीके से प्रस्तुत करते हैं, ताकि समाज में एक गहरी धार्मिक और सामाजिक खाई पैदा की जा सके।

    अक्सर मीडिया इन चर्चाओं को बढ़ावा देता है, जिससे पूरे समाज में एक तरह का उबाल उत्पन्न होता है। यह उबाल एक समय विशेष में लोकप्रियता तो दिला सकता है, लेकिन इसके दीर्घकालिक परिणाम समाज के लिए नुकसानदायक हो सकते हैं। जब राजनीतिक नेता मंदिरों के विषय को अपनी राजनीति का हिस्सा बनाते हैं, तो यह न केवल धार्मिक भावनाओं का दोहन करता है, बल्कि समाज में विभाजन भी पैदा करता है। आजकल सोशल मीडिया ने इन मुद्दों को और भी बढ़ा दिया है। सोशल मीडिया पर तथाकथित ‘स्वयंभू उद्धारक’ और ‘विचारक’ उभर आए हैं, जो मंदिरों और धार्मिक स्थलों को अपने एजेंडे के तहत उपयोग करने का प्रयास कर रहे हैं। ये लोग समाज के भावनात्मक मुद्दों का इस्तेमाल कर रहे हैं, जिससे समाज में और भी गहरी दरारें पैदा हो रही हैं।

    इसके परिणामस्वरूप समाज के एक हिस्से को यह विश्वास हो जाता है कि मंदिरों की ‘खोज’ और उनके संरक्षण का मामला अत्यधिक महत्वपूर्ण है, जबकि वास्तव में यह केवल राजनीतिक फायदे के लिए एक साधन बन जाता है। ऐसे तत्वों से बचने की आवश्यकता है, जो समाज की भावनाओं का दोहन करते हैं और इसे अपने स्वार्थ के लिए उपयोग करते हैं। मोहन भागवत का वक्तव्य इस बात की ओर संकेत करता है कि मंदिरों का महत्व केवल पूजा-अर्चना तक सीमित नहीं है। हमें मंदिरों के संरक्षण और उनके महत्व को केवल धार्मिक दृष्टिकोण से नहीं, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक संदर्भ में भी समझने की आवश्यकता है। उन्होंने यह भी कहा कि मंदिरों का मुद्दा राजनीति से ऊपर उठकर समझने की आवश्यकता है। यह वक्तव्य समाज से एक विवेकशील दृष्टिकोण अपनाने की अपील करता है।

    भारत में मंदिरों का संरक्षण और पुनर्निर्माण एक संवेदनशील मुद्दा है, जो केवल धार्मिक दृष्टिकोण से नहीं, बल्कि समाज और राष्ट्र की सांस्कृतिक धारा के संदर्भ में भी महत्वपूर्ण है। ऐसे में हमें मंदिरों से जुड़े मुद्दों पर विवेकपूर्ण चर्चा करनी चाहिए, न कि उन्हें सनसनीखेज तरीके से प्रस्तुत करके समाज में विभाजन पैदा करना चाहिए। कुल मिलाकर, मंदिरों से जुड़े मुद्दों को केवल राजनीति और मीडिया के चश्मे से देखना हमारे समाज के लिए हानिकारक हो सकता है। हमें इन मुद्दों को विवेकपूर्ण और संवेदनशील तरीके से समझने की आवश्यकता है। हम भारत के नागरिक होने के नाते यह सुनिश्चित कर सकते हैं कि मंदिरों का संरक्षण एक सांस्कृतिक और सामाजिक आवश्यकता है, न कि राजनीतिक लाभ के लिए साधन। समाज के नेताओं और विचारकों को चाहिए कि वे धार्मिक और सांस्कृतिक मामलों को राजनीति से ऊपर उठकर समझें, ताकि हम एक समृद्ध और एकजुट समाज की दिशा में आगे बढ़ सकें।

    धार्मिक और सांस्कृतिक मामलों को राजनीति से ऊपर उठकर समझने की जरूरत
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