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    नीट-यूजीसी पर सुप्रीम कोर्ट का राहत देने वाला फैसला

    News DeskBy News DeskJuly 31, 2024No Comments4 Mins Read
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    नीट-यूजीसी पर सुप्रीम कोर्ट का राहत देने वाला फैसला
    देवानंद सिंह
    सुप्रीम कोर्ट ने नीट पेपर लीक मामले में नीट-यूजीसी 2024 की परीक्षा दोबारा नहीं कराई जाएगी, यह बात स्पष्ट कर दी है। कोर्ट ने साफ कहा कि परीक्षा रद्द नहीं होगी। चीफ जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ का मानना था कि  दोनों पक्षों को सुनकर ये साफ होता है कि परीक्षा की शुचिता भंग ‘नहीं’ हुई है, इसलिए दोबारा परीक्षा कराए जाने की जरूरत नहीं है। सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के बाद दो बातें बिल्कुल साफ हैं। पहला-परीक्षाएं दोबारा करवाने का फैसला आखिरी विकल्प होगा और दूसरा अगर, उसे ऐसा लगा कि परीक्षा की पारदर्शिता प्रभावित हुई है तो वह इसे कैंसल करने से बिल्कुल भी नहीं हिचकेगा, उच्च न्यायालय की ये बातें छात्रों के लिहाज से काफी महत्वपूर्ण हैं।

     

    यहां यह भी स्पष्ट है कि सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला नीट-यूजीसी या फिर नेशनल टेस्टिंग एजेंसी के लिए किसी भी तरह की क्लीन चिट नहीं है, क्योंकि यहां सवाल केवल पेपरलीक की नहीं है, बल्कि परीक्षाओं में लगातार हो रही गड़बड़ी का भी है और ऐसी गड़बड़ियों पर एजेंसी का जिस तरह का रवैया रहा है, वह भी अत्यंत ही चिंताजनक है। लिहाजा, इसे अनदेखा करना अच्छा नहीं होगा, हालांकि नीट पेपर लीक मामले में सीबीआई की जांच जारी है और नीट प्रश्नपत्र लीक मामले में दो दर्जन से अधिक लोगों को गिरफ्तार किया जा चुका है। सीबीआई की जो जांच जारी है, इस जांच के दौरान ऐसे और नए साक्ष्य सामने आएं, जिनसे मामले के कुछ और अनछुए पहलू उजागर हों। यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि जांच पूरी गंभीरता से आगे बढ़े और अपनी तार्किक परिणति तक पहुंचे। दूसरी बात यह कि उच्च शिक्षा और व्यावसायिक शिक्षा से जुड़ी परीक्षाओं के संचालन को ज्यादा गंभीरता से लिया जाए। इस स्तर पर किसी भी तरह की गड़बड़ी या लापरवाही की गुंजाइश छोड़ना देश के भविष्य के साथ खिलवाड़ करने जैसा होगा।
    कोर्ट की सुनवाई के दौरान सामने आए तथ्यों ने स्पष्ट कर दिया कि परीक्षा में गड़बड़ी हुई है, लेकिन कोर्ट को इस बात में भी कोई संदेह नहीं कि जितने तथ्य सामने आए हैं उनके आधार पर इन गड़बड़ियां को व्यवस्थागत नाकामी का परिणाम नहीं कहा जा सकता। ऐसे में, परीक्षा निरस्त कर मेडिकल कॉलजों का सत्र बाधित करना और इस प्रकार भविष्य में डॉक्टरों की उपलब्धता प्रभावित होने देना कोर्ट ने ठीक ही तर्कसंगत नहीं माना जा सकता है।

     

     

    निश्चित ही, परीक्षा पेपर लीक मामला एक गंभीर समस्या है, जो शिक्षा प्रणाली के विश्वास को कम कर देता है और विद्यार्थियों के भविष्य को प्रभावित करता है। इस समस्या को रोकने के लिए कुछ महत्वपूर्ण कदम उठाए ही जाने चाहिए, जिसमें पेपर लीक के आरोपी व्यक्तियों और संगठनों पर कड़ी कानूनी कार्रवाई होनी चाहिए। कठोर दंड और सजा सुनिश्चित करनी चाहिए ताकि इस तरह के गलत कृत्यों को रोका जा सके। दूसरा, परीक्षा के पेपरों की सुरक्षा में सुधार करने के लिए प्रशासनिक व्यवस्था को मजबूत किया जाना चाहिए, इसमें पेपरों की सुरक्षा के लिए तकनीकी उपकरणों का उपयोग शामिल हो सकता है।

     

    वहीं, पेपरों को संगठनत रूप से प्रतिस्थापित करने के लिए नई नीतियों और प्रक्रियाओं को अपनाया जाना चाहिए और इसमें विशेषज्ञों द्वारा समीक्षा की जाने वाली पेपर बनाने की तकनीक को शामिल किया जाना चाहिए। सबसे महत्वपूर्ण शिक्षा प्रणाली में पारदर्शिता बढ़ाने के लिए, परीक्षाओं के विशेष विश्वसनीयता की जांच की जानी चाहिए, इसके लिए विकेंद्रीकृत शिक्षा व्यवस्था ही पेपरलीक का विकल्प हो सकता है। समाज को भी मिलकर इसमें काम करना होगा, जिन राज्यों में संस्थाएं हैं, उन्हें खासकर नीट के संबंध में अपने राज्य के लिए खुद डॉक्टरों-इंजीनियरों का मूल्यांकन करना चाहिए, तभी एक बेहतर राह तय होगी।

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