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    Home » लुप्त हो रही भाषाओं को ढूंढ़ने और संरक्षित करने की जरूरत है- डॉ. सच्चिदानंद जोशी
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    लुप्त हो रही भाषाओं को ढूंढ़ने और संरक्षित करने की जरूरत है- डॉ. सच्चिदानंद जोशी

    Devanand SinghBy Devanand SinghFebruary 22, 2024No Comments3 Mins Read
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    क्वालिटी एजुकेशन का मूल है लिंग्विस्टिक एजुकेशन- लिलि पांडेय, संयुक्त सचिव, केन्द्रीय संस्कृति मंत्रालय
    लुप्त हो रही भाषाओं को ढूंढ़ने और संरक्षित करने की जरूरत है- डॉ. सच्चिदानंद जोशी
    – आईजीएनसीए में अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस पर तीन दिवसीय संगोष्ठी प्रारंभ

    विश्व में आपसी भाईचारे को बढ़ाने व संस्कृति के आदान-प्रदान में भाषाओं का योगदान बेहद अहम है। हमारी भाषाएं हमारी पहचान हैं। मातृभाषा प्रारम्भिक संस्कार और व्यवहार की आधारशिला है। भाषाओं के इसी महत्त्व को स्वीकारते हुए यूनेस्को ने 17 नवंबर, 1999 को अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस मनाने की घोषणा की थी। 21 फरवरी, 2000 से दुनिया भर में अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस मनाया जा रहा है।

     

     

    अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस के अवसर पर इन्दिरा गांधी राष्ट्रीय कला केन्द्र में बुधवार को तीन दिवसीय संगोष्ठी का शुभारम्भ हुआ। आईजीएनसीए के कला निधि प्रभाग एवं यूनेस्को, नई दिल्ली के संयुक्त तत्वाधान में आयोजित इस उत्सव में पैनल चर्चा सत्र में मुख्य अतिथि के रूप में केन्द्रीय संस्कृति मंत्रालय की संयुक्त सचिव श्रीमती लिलि पाण्डेय मौजूद रहीं। अपने संबोधन में उन्होंने कहा कि हाल ही में नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति लागू की गई है, जिसमें भाषाई विविधता को बहुत ही मत्वपूर्ण स्थान दिया गया है। इसके साथ ही, नई शिक्षा नीति में भाषाई विविधता को प्रमुख भाग के रूप में जोड़ा गया है। इसके अलावा, उन्होंने कहा कि दरअसल क्वालिटी एजूकेशन का मूल है लिंग्विस्टिक एजुकेशन। लिलि पाण्डेय ने कहा कि कल्चर आपका ध्यान अपना लक्ष्य प्राप्त करने की ओर आकर्षित करने में मदद कर सकता है। उन्होंने आगे कहा कि पहली बार समूचे विश्व के नेता भारत की अध्यक्षता में भविष्य के विकास के लिए कल्चर के महत्त्वपूर्ण योगदान पर सहमत हुए हैं। संस्कृति के विभिन्न आयामों को ध्यान में रखते हुए हमें कल्चर को प्रोत्साहन देने का प्रयास करना चाहिए।

     

     

    उन्होंने कहा कि दरअसल जो कुछ भी सांस्कृतिक विरासत हमारे पास अंतर्निहित है, हम उसे अपनी आने वाली पीढ़ियों को दे सकें, वही सतत विकास है। इसके अलावा हम कैसे अपनी संचित भाषाई विविधता को अपनी आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचा सकते हैं।
    कार्यक्रम में अपने विचार व्यक्त करते हुए यूनेस्को, नई दिल्ली की सीनियर जेंडर स्पेलिस्ट डॉ. हुमा मसूद ने कहा कि भाषाई विविधता को प्रोत्साहित करने के लिए यूनेस्को ने बहुत ही महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है। डॉ. हूमा मसूद ने यह भी बताया कि किस तरह से यूनेस्को ने भाषाई विविधता को बढ़ावा देने के उद्देश्य से 21 फरवरी को अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस मनाने की शुरूआत की थी।
    इस मौके पर कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे आईजीएनसीए के सदस्य सचिव डॉ. सच्चिदानन्द जोशी ने कहा कि आज हम जब मातृभाषा दिवस मनाते हैं, तो भारत के बहुभाषाई समाज का वास्तविक स्वरूप सामने आता है। डॉ. सच्चिदानन्द जोशी ने बताया कि यूनेस्को के ‘एटलस सर्वे’ में भारत में कुल 454 भाषाएं रजिस्टर हुई थीं। वहीं 1961 में जब हमारा भाषा सर्वे हुआ था, तो उसके अनुसार हमारे देश में कुल 600 भाषाएं बोली जाती थीं। उन्होंने कहा कि चिंता की बात है कि 900 से ज्यादा भाषाएं ऐसी हैं, जिनके केवल नाम मालूम हैं, लेकिन उनसे सम्बंधित तथ्य नहीं हैं। ऐसे में आज हमें उन भाषाओं को ढूंढ़ने और उनको संरक्षित करने की जरूरत है।

     

     

    अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस के पहले दिन आईजीएनसीए द्वारा निर्मित डॉक्यूमेंट्री फिल्म ‘डिक्लाइन इन डायलेक्ट्स’ का प्रदर्शन भी किया गया। यह विचारोत्तेजक डॉक्यूमेंट्री फिल्म लुप्त हो रही बोलियों के विभिन्न पक्षों पर प्रकाश डालती है, उनकी सूक्ष्म पड़ताल करती है। कलानिधि प्रभाग के विभागाध्यक्ष और डीन (प्रशासन) प्रो. रमेश चन्द्र गौड़ ने इस दौरान कार्यक्रम में आए सभी अतिथियों एवं आगंतुकों का स्वागत एवं धन्यवाद किया।

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