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    Home » शिक्षा बीच में छोड़ने की बढ़ती प्रवृत्ति चिन्ताजनक
    Headlines राष्ट्रीय शिक्षा संवाद विशेष

    शिक्षा बीच में छोड़ने की बढ़ती प्रवृत्ति चिन्ताजनक

    Devanand SinghBy Devanand SinghAugust 3, 2023Updated:August 3, 2023No Comments7 Mins Read
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    शिक्षा बीच में छोड़ने की बढ़ती प्रवृत्ति चिन्ताजनक
    – ललित गर्ग –
    आजादी के अमृतकाल को सार्थक करने में शिक्षा ही सर्वाधिक महत्वपूर्ण हो सकती है। कहा जा सकता है कि शिक्षा ही एक ऐसा हथियार भी है जिससे इंसान न केवल खुद को, बल्कि समाज, राष्ट्र एवं दुनिया को भी बदल सकता है। बात जब नया भारत-सशक्त भारत बनाने की हो रही है तो शिक्षा के प्रति सकारात्मक सोच विकसित करने एवं सर्वाधिक ध्यान देने की जरूरत है। लेकिन चिंता की बात यह है कि सरकारों की इस सकारात्मक सोच के बावजूद हमारी शिक्षा प्रणाली विपरीत संकेत देती रही है। भारत में उच्च शिक्षा एवं स्कूली शिक्षा में छात्र-छात्रों के ड्रॉपआउट्स की संख्या यानी बीच में ही पढ़ाई छोड देने की संख्या बढ़ना न केवल शिक्षा-व्यवस्था पर बल्कि सरकार की शिक्षा नीति एवं व्यवस्था पर एक बड़ा सवाल बनता जा रहा है। संसद में दिये गये एक जबाव के अनुसार देश के नामी उच्च शिक्षण संस्थानों में पिछले पांच साल के दौरान 34 हजार से ज्यादा छात्र बीच में ही पढ़ाई छोड़ गए। दूसरी ओर केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय की ओर से सन् 2022 की बोर्ड परीक्षाओं के विश्लेषण में बताया गया है कि दसवीं और बारहवीं के स्तर पर देश में लाखों बच्चे पढ़ाई छोड़ देते हैं।

     

     

     

     

    विश्लेषण के मुताबिक, पिछले साल पैंतीस लाख विद्यार्थी दसवीं के बाद ग्यारहवीं कक्षा में पढ़ने नहीं गए। इनमें से साढ़े सत्ताइस लाख सफल नहीं हुए और साढ़े सात लाख विद्यार्थियों ने परीक्षा नहीं दी। इसी तरह, पिछले साल बारहवीं के बाद 2.34 लाख विद्यार्थियों ने बीच में पढ़ाई छोड़ दी। इनमें से सतहत्तर फीसद ग्यारह राज्यों से थे। यानी करीब अट्ठावन लाख विद्यार्थी दसवीं और बारहवीं में पढ़ाई छोड़ देते हैं तो यह किसी भी सरकार के लिए बेहद चिंता की बात होनी चाहिए और यह समग्र शिक्षा व्यवस्था से लेकर सरकारी कल्याण कार्यक्रमों के जमीनी स्तर पर अमल पर सवालिया निशान है।
    बात उच्च शिक्षा की करें तो वैश्विक मापदण्डों पर हमारी शिक्षण संस्थाएं काफी पीछे नजर आती हैं। यह तो तब है जब आजादी के 76 सालों में सरकारों ने शिक्षा के प्रसार की दिशा में काफी प्रयास किये, बहुआयामी योजनाओं को आकार दिया एवं बजट में भी भारी भरकम प्रावधान किये हैं। 34 हजार से ज्यादा बीच में ही पढ़ाई छोड़ देने वाले छात्रों में भी दलित, आदिवासी और पिछड़े वर्ग के विद्यार्थी ज्यादा हैं। ये संस्थान कोई सामान्य सरकारी कॉलेज नहीं बल्कि आइआइटी, एनआइटी और आइआइएसईआर, आइआइएम व केन्द्रीय विश्वविद्यालय और इनके जैसे स्तर के हैं।

     

     

     

     

    ऐसे संस्थानों में क्या पढ़ाई का स्तर व माहौल उचित नहीं है? सरकार और देश के शिक्षाविदों को इस तथ्य को लेकर भी चिंता करनी ही होगी कि बीतेे पांच साल में इन उच्च शिक्षण संस्थानों में दाखिला लेने वाले 92 विद्यार्थियों ने पढ़ाई के बीच में ही आत्महत्या क्यों कर ली? ऐसे ही आईआईटी बुम्बई के फर्स्ट ईयर के छात्र दर्शन सोलंकी ने पिछले दिनों खुदकुशी कर ली, इसके बाद वहां के छात्रों से अधिकारिक तौर पर कहा गया है कि छात्र एक दूसरे से जी (एडवांस) रैंक या गेट स्कोर के बारे में पूछताछ न करें। न ही ऐसा कोई सवाल करें जिससे छात्र की जाति और उससे जुड़े पहलू उजागर होते हो। इस तरह की गाइडलाइन की जरूरत केवल आईआईटी बुम्बई को ही नहीं, बल्कि सभी उच्च शिक्षण संस्थानों को हैं। लेकिन सवाल तो यह भी है कि क्या ऐसे सांकेेतिक कदमों से आत्महत्या की बढ़ती संख्या जैसी गंभीर समस्याओं को हल किया जा सकता है।
    किसी भी देश की शिक्षा व्यवस्था की कामयाबी इसमें है कि शुरुआती से लेकर उच्च स्तर तक की शिक्षा हासिल करने के मामले में एक निरंतरता हो। अगर किसी वजह से आगे की पढ़ाई करने में किसी विद्यार्थी के सामने अड़चनें आ रही हो तो उसे दूर करने के उपाय किये जाएं। लेकिन बीते कई दशकों से यह सवाल लगातार बना हुआ है कि एक बड़ी तादाद में विद्यार्थी स्कूल-कॉलेजों में बीच में ही पढ़ाई छोड़ देते हैं और उनकी आगे की पढ़ाई को पूरा कराने के लिए सरकार की ओर से ठोस उपाय नहीं किए जाते। इस मसले पर सरकार से लेकर शिक्षा पर काम करने वाले संगठनों की अध्ययन रपटों में अनेक बार इस चिंता को रेखांकित किया गया है, लेकिन अब तक इसका कोई सार्थक हल सामने नहीं आ सका है।

     

     

     

    तमाम सरकारी प्रयासों एवं योजनाओं के शिक्षा महंगी होती जा रही है, प्रतिस्पर्धा बढ़ती जा रही है, स्तर के स्कूलों एवं कालेजों में प्रवेश असंभव होने से निजी स्कूलों एवं कालेजों में बच्चों को पढ़ाना विवशता बनती जा रही है। कोई परिवार हिम्मत करके निजी स्कूलों एवं कालेजों में प्रवेश दिलाते भी है तो आर्थिक मजबूरी के कारण उन्हें बीच में बच्चों को स्कूल से निकाल लेने को विवश होता पड़ता है। सरकार की बड़ी-बड़ी योजनाओं के बीच छात्रों के स्कूल-कालेज छोड़ने की स्थितियों को गंभीरता से लेना होगा। शिक्षा को पेचिदा बनाने की बजाय सहज, निष्कंटक, कम खर्चीली एवं रोचक बनाना होगा। शिक्षा को रोचक बनाना भी जरूरी है ताकि कुछ बच्चों को स्कूल-कालेज बोरिंग न लगे है, 9वीं और 10वीं कक्षा तक आते-आते कई बच्चों को स्कूल-कालेज बोरिंग लगने लगता है। इस कारण वे स्कूल-कालेज देरी से जाना चाहते हैं, क्लास बंक कर देते हैं और लंच ब्रेक में बैठे रहते हैं। पढ़ाई से लगाव ना होने की वजह से अक्सर छात्र स्कूल-कालेज छोड़ देते हैं। किसी भी वजह से छात्रों का पढ़ाई छोड़ने का मन करना, पैरेंट्स के लिए एक बड़ी परेशानी है, लेकिन यह शिक्षा की एक बड़ी कमी की ओर भी इशारा भी करता है।

     

    बच्चों को स्कूल भेजे जाने का उद्देश्य शिक्षा ग्रहण कर एक अच्छा नागरिक बनना तो है ही, शिक्षा विकोपार्जन एवं उन्नत राष्ट्र-निर्माण में भी प्रमुख भूमिका निभाती है। लेकिन मौजूदा समय में ज्यादातर स्कूल-कालेज प्रबंधन इसे एक व्यवसाय के रूप में देखने लगे हैं, सरकारें भी शिक्षा की जिम्मेदारी से भाग रही है, भारत में शिक्षा का अधिकार कानून लागू होने के बाद ज़मीनी स्तर पर बहुत सारी चीज़ें बदली हैं। मसलन स्कूलों में बच्चों का नामांकन बढ़ा है। हर साल आठवीं पास करने वाले बच्चों की संख्या के आँकड़े तेज़ी से बढ़े हैं। पर इसके साथ ही शिक्षा में गुणवत्ता और स्कूल में बच्चों के ठहराव का सवाल ज्यों का त्यों कायम है। विशेषतः उच्च शिक्षण संस्थानों में छात्रों का बीच में पढ़ाई छोड़ देना, एक गंभीर समस्या बनता जा रहा है। तमाम दूसरे क्षेत्रों में हमारी प्रतिभाओं का दुनिया लोहा मानती है। यह भी सच है कि हमारे इन नामी-गिरामी उच्च शिक्षण संस्थानों में दाखिले भी कड़ी स्पर्धा के बीच होते हैं। इसके बावजूद विद्यार्थी क्यों ऐसे संस्थानों से भी मुंह मोड़ते दिख रहे हैं इस बात पर सरकारों को गहनता से विचार करना होगा। अन्यथा ऐसे संस्थानों से बीच में पढ़ाई छोड़कर जाने का सिलसिला थमने वाला नहीं।

     

     

     

    देश में शिक्षा के स्तर के सुधार की दिशा में किए जा रहे प्रयासों के बीच इस हकीकत से भी मुंह नहीं मोड़ा जा सकता कि दुनिया के शीर्ष सौ उच्च शिक्षण संस्थानों में भारत से एक भी नाम नहीं है। आज भी सक्षम परिवारों की उच्च शिक्षा के लिए पहली पसंद विदेश के शिक्षण संस्थान बने हुए हैं। संसाधनों की कमी और बेहतर शिक्षकों का अभाव इसकी वजह हो सकती है। लेकिन यह भी सही है कि अफसरशाही के रवैये के चलते हमारे बेहतर कहे जाने वाले शिक्षण संस्थानों में भी पढ़ाई का माहौल नहीं बन पाता। सरकारी योजनाओं एवं नीतिगत स्तर पर शिक्षा को उच्च प्राथमिकता मिलती दिखती है, बावजूद इसके छात्रों के बीच में पढ़ाई छोड़ने की प्रवृत्ति नीतिगत स्तर पर नाकामी या फिर उदासीनता का ही सूचक है। यह समझना मुश्किल है कि इतने लंबे वक्त से यह चिंता कायम है फिर क्यों नहीं इस मसले पर किसी हल तक पहुंचना एक ऐसा सवाल है जिस पर व्यापक चिन्तन-मंथन जरूरी है। यह जगजाहिर है कि एक ओर स्कूल-कालेज में शिक्षा पद्धति में तय मानक बहुत सारे विद्यार्थियों के लिए सहजता से ग्राह्य नहीं होते, वहीं पढ़ाई में निरंतरता नहीं रहने के पीछे पठन-पाठन के स्वरूप से लेकर गरीबी, पारिवारिक, सामाजिक और अन्य कई कारकों से जुड़ा हुआ है और इसके समाधान के लिए सभी बिंदुओं को एक सूत्र में रखकर ही देखने की जरूरत होगी।

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