झारखण्ड की अंगुर है महुआ।
विपुल गोस्वामी
फतेहपुर जामताड़ा, (झारखण्ड)झारखण्ड की अंगुर आदिवासी का जीवन आधार है।कहने का तात्पर्य है कि हरे भरे हरियाली के बीच जिसका जीवन मरन का डोर बंधा हो,फल ,फूल और बृक्ष सदा छाया से लेकर गृह की छत्रछाया तक सभी प्राणी का निस्वार्थ भाव से सेवा करते चला आ रहा है।
आते है मूल विन्दु पर आखिर वो कौन सा फल है जिसे हम झारखण्डी अंगूर कहते है।वो फल नहीं वल्कि फूल है महुआ। महुआ को हम कच्चा सेवन कर सकते है, सुखा कर भूंज के खाते है।अंगूर से जैसे मदिरा बनाया जाता है।वैसे ही महुआ को भी झारखंडी मदिरा पद्वति के द्वारा मदिरा,मद ,शराब बनाया जाता है।करुना काल मे आदिवासी को प्रभावित नही कर पाया था जिसका मूलत कारण अथक परिश्रम के पश्चात मदिरा का सेवन करने के कारण आदिवासी के अंदर यूनिटी पावर फुल के चलते करूना अपना प्रभाव डाल नही सका।
लेकिन सेवन की मापदंड सही होना चाहिए नही तो परिणाम भयावह हो सकता है।
महुआ क्या है —–अप्रैल माह मे महूल बृक्ष मे उत्पन्न फूल जो महुआ है, ये हर वक्त बृक्ष के बृन्त से नहीं टपकता है ।बिहाने बिहाने जब मलय बयार महूल बृक्ष को सहलाते हुए गुदगुदी देता है तब बृक्ष की बृन्त से बिच्छेद हो कर नीचे टपकता है महुआ । महुआ का टपकना कुछ समय के लिए ही होता है।सूर्य के आगमन के आहट से महुआ का टपकना बंद हो जाता है।समय सीमा मे आया तो पाया ।ये अनुशासित के पाठ के साथ कर्तव्यनिष्ठ होने का प्रेरणा भी देता है।आदिवासी इसे जीवन रक्षक सुरक्षा का प्रतीक मानते है ।आदिवासी का जीवन यात्रा महुआ का यांत्रिक पद्धति के रस से होता है और पूजा पाठ के साथ अंतिम विदाई तक महुआ का रस चढाना और सेवन करना पड़ता है। रूप लावण्य मे अंगुर से महुआ का कम नही है जो अनायास अपने ओर आकृष्ट करने का शक्ति रखता है।

