शहर के बीचों-बीच एक और शहर। शहर अपने साथ शहर का ही एक अलिखित काला अध्याय समेटे हुए है। यहाँ बहुत से ऐसे लोग हैं जो नहीं होने चाहिए, बहुत सी ऐसी बातें हैं जिनके बारे में नहीं सोचा जाना चाहिए। एक ऐसा मानव-जीवन जो जीवन जैसा नहीं है। जहाँ जवानी की कोई क़ीमत नहीं। ज़िंदगी और जवानी की क़ीमत चावल के कुछ निवाले या दो रोटियों से मापी जाती है। एक वक्त की रोटी से दूसरे वक्त की रोटी तक बड़ी फ़ासला है। अश्लील भाषा, गाली-गलौज, सबकुछ जायज है यहां। शराब और गांजा यहाँ छिपकर पीने की जरूरत नहीं हैं। धोखाधड़ी यहां की प्राकृतिक धंधा है। यहां मानवरूपी एक टोली वास करता है जो दिखने में मटमैला रंग का है। इस शहर के बीच से गुज़रती है एक लंबी रेलवे लाइन जिसके दोनों ओर छोटे-छोटे घर बसे हुए है । बांस की टूटी हुई बाड़ ,पॉलीथीन, बोरों से बंधे छोटे-छोटे घरों में रहते हैं बड़े-बड़े परिवार । रात होते ही एक ही घर के अंदर घुस जाते हैं दूबले पतले तीन-चार बच्चे। गरीबी से जूझती हुई एक पत्नी जिसकी त्वचा ,हड्डियों से चिपक चूकी है और है एक आदमी जिसके गाल सूखे हैं और आँखें ज़रूरत से ज़्यादा बड़ी हैं। सुबह-सुबह जब ऊँची इमारतों की दरारों से सूरज की रोशनी रेल की सीढ़ियों पर पड़ती है, तो बच्चे घरों से ऐसे निकल आते हैं जैसे चीटियां सुरंग से बाहर निकल आती हैं। हर कंधे पर एक बड़ा सा बोरा खास अंदाज़ में लटका होता है। वे शहर की गलियों में प्लास्टिक की बोतलें, डिब्बे और दूसरी चीज़ें ढूँढ़ते फिरते हैं। वे उजाले से अँधेरे तक ज़िंदा रहने की जद्दोजहद करते हैं।
वे गरीबी, स्वास्थ्य समस्याओं, सामाजिक अलगाव, असुरक्षा और चिंता सहित कई समस्याओं का सामना करते हैं, जो उनके जीवन को बेहद कठिन बना देती हैं। इन समस्याओं का स्रोत खोजते ही उनकी कमियां उजागर हो जाता है। वे गरीबी के शिकार हैं। उन्हें भोजन, पानी, कपड़े और अन्य बुनियादी ज़रूरतों को पूरा करने के लिए पर्याप्त सहायता की आवश्यकता होती है। दूसरी बात, उन्हें स्वास्थ्य संबंधी समस्याएँ भी हैं। पर्याप्त स्वच्छता की कमी और खराब पोषण के कारण वे विभिन्न बीमारियों से पीड़ित हैं। तीसरा, सामाजिक अलगाव । समाज में उनके लिए कोई खास जगह नहीं है, इसलिए वे अकेलापन और निराशा महसूस करते हैं। चौथा, वे असुरक्षा से ग्रस्त हैं। उनके साथ सामाजिक दुर्व्यवहार किया जाता है और उनकी सुरक्षा भी न के बराबर है। वे तनाव, अभाव, सामाजिक बहिष्कार और असुरक्षा के कारण मानसिक रूप से बेहद कमज़ोर हैं। उनके पास शिक्षा का अभाव है। उनमें से अधिकांश शिक्षा से वंचित हैं, जिससे उनके पास अपना जीवन सुधारने का कोई अवसर नहीं बचता।
इसलिए सरकार को चाहिए कि वे शहर की सड़कों में ऐसे घुमतें-फिरते बच्चों के लिए मदद का हाथ बढ़ाएँ। उनके प्रति समाज में हमदर्दी और आत्मीयता बढ़ाई जाएँ। सरकारी योजनाएँ उन्हें ठीक से उपलब्ध कराया जाएँ और उनकी समस्याओं का समाधान करके उन्हे उबारा जाएँ ।
अन्यथा, शहर के अंदर समाया हुआ यह दूसरा शहर हमारे लिए यह एहसास कराएगा कि मैं खुद से ही अनजान हूं ।
मूल लेखिका : मनीषा शर्मा
अनुवादक :रितेश शर्मा
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