लेखक: नितेश सिंह राजपूत
बिहार में ट्रिपल टेस्ट की प्रक्रिया पूरी हुए बिना त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव कराना संभव नहीं है। राज्य सरकार ने पटना हाईकोर्ट में दायर हलफनामे में साफ कर दिया है कि परिसीमन, आरक्षण रोस्टर और ट्रिपल टेस्ट की अनिवार्य शर्तें पूरी होने तक चुनाव की घोषणा नहीं की जा सकती। मौजूदा पंचायतों और ग्राम कचहरियों का कार्यकाल दिसंबर 2026 से जनवरी 2027 के पहले सप्ताह में समाप्त हो रहा है, लेकिन प्रशासनिक तैयारियां अधूरी हैं।
ट्रिपल टेस्ट क्यों है अनिवार्य?
सुप्रीम कोर्ट के स्पष्ट आदेश के अनुसार अति पिछड़ा वर्ग (EBC) को 20 प्रतिशत आरक्षण देने के लिए ट्रिपल टेस्ट अनिवार्य है। इस टेस्ट के तीन चरण होते हैं: पहला, पिछड़ेपन का आंकड़ा जुटाने के लिए आयोग का गठन; दूसरा, आयोग की सिफारिशों के आधार पर आरक्षण का प्रतिशत तय करना; तीसरा, कुल आरक्षण 50 प्रतिशत की सीमा से अधिक न हो। इसके बिना आरक्षण की सीमा कानूनी रूप से तय नहीं हो सकती।
सरकार ने हाईकोर्ट में क्या पक्ष रखा?
5 अक्टूबर को हुई सुनवाई में सरकार ने बताया कि संविधान के अनुच्छेद 243-E के तहत पंचायतों का कार्यकाल खत्म होने से पहले चुनाव कराना राज्य निर्वाचन आयोग की जिम्मेदारी है। लेकिन परिसीमन और नए आरक्षण रोस्टर को अंतिम रूप देना संवैधानिक बाध्यता है। सरकार ने कहा कि जब तक यह प्रक्रिया पूरी नहीं होगी, चुनाव अधिसूचना जारी नहीं की जा सकती। अगली सुनवाई 26 नवंबर को निर्धारित है।
अति पिछड़ा वर्ग आयोग की भूमिका
बिहार राज्य अति पिछड़ा वर्ग आयोग के अध्यक्ष और सदस्य फिलहाल जिलेवार दौरा कर जमीनी हकीकत की पड़ताल कर रहे हैं। आयोग राजनीतिक पिछड़ेपन पर अपनी अनुशंसा सरकार को सौंपेगा। इस कवायद में कई महीने लगने का अनुमान है। विशेषज्ञों का मानना है कि आयोग की रिपोर्ट आने, कैबिनेट मंजूरी और अधिसूचना जारी होने में 2027 की पहली तिमाही बीत सकती है।
बखरी-बेगूसराय के स्थानीय राजनीतिक विश्लेषक बताते हैं कि इस देरी से ग्रामीण विकास योजनाओं पर असर पड़ेगा। वार्ड सदस्य, मुखिया, सरपंच और जिला परिषद सदस्यों के अधिकार कार्यकाल खत्म होने के साथ ही समाप्त हो जाएंगे। ऐसे में प्रशासनिक अधिकारियों को प्रभार सौंपा जा सकता है, लेकिन यह व्यवस्था अस्थायी होगी।
कब तक हो सकता है चुनाव?
अभी तक कोई आधिकारिक तारीख घोषित नहीं हुई है, लेकिन प्रशासनिक सूत्रों का अनुमान है कि अगर 2027 में चुनाव होता है तो मार्च-अप्रैल महीने में आयोजित हो सकता है। इससे पहले परिसीमन आयोग की रिपोर्ट, आरक्षण रोस्टर का प्रकाशन, दावा-आपत्ति निपटारा और अंतिम अधिसूचना की लंबी प्रक्रिया पूरी करनी होगी। बिहार में लगभग 8,000 पंचायतों और 1.15 लाख बूथों पर मतदान होना है, जिसके लिए वृहद सुरक्षा बल और मतदानकर्मियों की तैनाती भी एक बड़ी चुनौती है।
इस बीच, भारत निर्वाचन आयोग की गाइडलाइन के अनुसार मतदाता सूची का विशेष संक्षिप्त पुनरीक्षण कार्यक्रम भी चल रहा है। पंचायत चुनाव के लिए अलग मतदाता सूची नहीं होती, बल्कि विधानसभा वाली सूची ही मान्य होती है। ऐसे में मतदाता सूची अद्यतन होने तक इंतजार करना पड़ सकता है।
कुल मिलाकर ट्रिपल टेस्ट की जटिल कानूनी प्रक्रिया और प्रशासनिक तैयारियों के अभाव में बिहार के लाखों ग्रामीण मतदाताओं को अपने जनप्रतिनिधि चुनने के लिए अभी और इंतजार करना पड़ सकता है।

