लेखक: देवानंद सिंह
झारखंड में 16 माओवादियों का पुलिस के समक्ष आत्मसमर्पण केवल एक सुरक्षा संबंधी उपलब्धि नहीं है, बल्कि यह उस व्यापक रणनीति की सफलता का संकेत भी है, जिसके माध्यम से राज्य सरकार और सुरक्षा एजेंसियां पिछले कुछ वर्षों से नक्सलवाद को जड़ से समाप्त करने के लिए लगातार प्रयासरत हैं।
झारखंड लंबे समय तक देश के सबसे अधिक नक्सल प्रभावित राज्यों में गिना जाता रहा है। राज्य के कई जिले वर्षों तक हिंसा, भय और अविकास के दुष्चक्र में फंसे रहे। सड़क निर्माण, स्कूल, स्वास्थ्य केंद्र, बिजली परियोजनाएं और खनन गतिविधियां तक नक्सली हिंसा से प्रभावित होती थीं। निर्दोष ग्रामीणों, जनप्रतिनिधियों, पुलिसकर्मियों और विकास कार्यों को बार-बार निशाना बनाया गया। ऐसे माहौल में राज्य के समग्र विकास की कल्पना भी कठिन थी। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में सुरक्षा अभियानों की निरंतरता और विकास योजनाओं के विस्तार ने इस तस्वीर को बदलना शुरू किया है।
बड़े नक्सली नेताओं का आत्मसमर्पण
ताजा आत्मसमर्पण की सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इसमें संतोष महतो जैसे बड़े माओवादी नेता भी शामिल हैं, जिन पर 128 मामलों में वांछित होने और 15 लाख रुपये के इनाम की घोषणा थी। चंदन लोहरा सहित अन्य इनामी उग्रवादियों का मुख्यधारा में लौटना यह दर्शाता है कि संगठन के भीतर भी भविष्य को लेकर निराशा बढ़ रही है। जब नेतृत्व स्तर के लोग ही हथियार छोड़ने लगें, तो यह किसी भी उग्रवादी संगठन के कमजोर पड़ने का सबसे बड़ा संकेत माना जाता है।
नक्सलवाद को जड़ से समाप्त करने की रणनीति
इस सफलता का श्रेय केवल पुलिस की कार्रवाई को देना पर्याप्त नहीं होगा। झारखंड सरकार ने एक ओर सुरक्षा बलों को आधुनिक संसाधनों, बेहतर खुफिया तंत्र और समन्वित अभियान के माध्यम से मजबूत किया है, वहीं दूसरी ओर आत्मसमर्पण और पुनर्वास नीति के जरिए यह संदेश भी दिया है कि जो लोग हिंसा छोड़कर लोकतांत्रिक व्यवस्था में विश्वास जताना चाहते हैं, उनके लिए सम्मानजनक जीवन का रास्ता खुला है। यही संतुलित नीति आज सकारात्मक परिणाम देती दिखाई दे रही है।
आत्मसमर्पण में सौंपे गए हथियार
आत्मसमर्पण के दौरान छह इंसास राइफल, दो एके-47, 38 मैगजीन और 1,562 कारतूस पुलिस को सौंपे गए। यह केवल हथियारों का जमा होना नहीं है, बल्कि हिंसा की एक पूरी मानसिकता का कमजोर पड़ना भी है। हर जमा हुई बंदूक भविष्य में किसी पुलिसकर्मी, ग्रामीण, शिक्षक या विकास कार्य पर होने वाले संभावित हमले को कम करती है। इसलिए ऐसे आत्मसमर्पण का महत्व केवल आंकड़ों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह आम नागरिक के जीवन में सुरक्षा और विश्वास की भावना को भी मजबूत करता है।
सुरक्षा अभियानों के ताजा आंकड़े
पुलिस के अनुसार वर्ष 2026 में अब तक 45 माओवादियों ने आत्मसमर्पण किया है, 93 गिरफ्तार हुए हैं और 22 माओवादी मुठभेड़ों में मारे गए हैं। यह बताता है कि सरकार ने नक्सलवाद के खिलाफ लगातार दबाव बनाए रखा है। ऐसे अभियानों का सबसे बड़ा प्रभाव यह होता है कि संगठन की भर्ती, आर्थिक संसाधन और संचालन क्षमता कमजोर पड़ती है। जब नेतृत्व लगातार गिरफ्तार हो, मारा जाए या आत्मसमर्पण करे, तब संगठन का विस्तार स्वतः रुकने लगता है।
सुरक्षा के साथ विकास जरूरी
हालांकि यह भी ध्यान रखना होगा कि केवल सुरक्षा अभियान किसी भी उग्रवाद की स्थायी समाप्ति का समाधान नहीं हो सकता। जिन इलाकों में वर्षों तक नक्सलवाद का प्रभाव रहा है, वहां सड़क, शिक्षा, स्वास्थ्य, पेयजल, रोजगार और जनजातीय समुदायों के अधिकारों से जुड़े विकास कार्यों को समान गति से आगे बढ़ाना होगा। यदि विकास की गति कमजोर पड़ी या प्रशासन जनता का विश्वास जीतने में असफल रहा, तो असंतोष की परिस्थितियां फिर पैदा हो सकती हैं। इसलिए सुरक्षा और विकास—दोनों को समान महत्व देना आवश्यक है।
विकास योजनाओं का असर
झारखंड सरकार ने हाल के वर्षों में जिन दूरस्थ इलाकों तक सड़क, बिजली, मोबाइल नेटवर्क, बैंकिंग सेवाएं और सरकारी योजनाएं पहुंचाने का प्रयास किया है, उसका सकारात्मक असर अब स्पष्ट दिखाई देने लगा है। जब गांवों तक शासन की पहुंच मजबूत होती है और युवाओं के सामने शिक्षा व रोजगार के अवसर बढ़ते हैं, तब बंदूक का आकर्षण स्वतः कम होने लगता है। यही किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था की सबसे बड़ी जीत होती है।
निरंतरता ही सफलता की कुंजी
यह उपलब्धि सुरक्षा बलों के साहस, पुलिस नेतृत्व की रणनीति और सरकार की नीति का परिणाम है। लेकिन इसे अंतिम मंजिल नहीं माना जा सकता। अभी भी राज्य के कुछ हिस्सों में नक्सली गतिविधियों की चुनौती पूरी तरह समाप्त नहीं हुई है। इसलिए अभियान की निरंतरता, बेहतर खुफिया तंत्र, स्थानीय लोगों का विश्वास और विकास की रफ्तार बनाए रखना उतना ही आवश्यक है।
16 माओवादियों का आत्मसमर्पण केवल एक दिन की खबर नहीं, बल्कि यह उस बदलते झारखंड का संकेत है जहां हिंसा की जगह संवाद, भय की जगह विश्वास और बंदूक की जगह विकास की राह मजबूत होती दिखाई दे रही है। यदि यही रणनीति इसी दृढ़ता के साथ आगे बढ़ती रही, तो वह दिन दूर नहीं जब झारखंड पूरी तरह नक्सलवाद मुक्त राज्य के रूप में देश के सामने एक नई पहचान स्थापित करेगा।
