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    Home » पत्रकारिता दिवस: कलम की धार रहे तेज, लोकतंत्र का चौथा स्तंभ मजबूत
    खबरें राज्य से झारखंड राष्ट्रीय संपादकीय

    पत्रकारिता दिवस: कलम की धार रहे तेज, लोकतंत्र का चौथा स्तंभ मजबूत

    Nikunj GuptaBy Nikunj GuptaMay 30, 2026No Comments4 Mins Read
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    पत्रकारिता दिवस
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    “लोकतंत्र के चौथे स्तंभ को मजबूत करने के लिए पत्रकारों की सुरक्षा और सम्मान सुनिश्चित करना समय की आवश्यकता है।”

    लेखक: देवानंद सिंह

    हर वर्ष पत्रकारिता दिवस हमें केवल एक तिथि का स्मरण नहीं कराता, बल्कि उस जिम्मेदारी की याद दिलाता है जो लोकतंत्र के चौथे स्तंभ के कंधों पर टिकी है। पत्रकारिता का मूल उद्देश्य सत्ता, व्यवस्था और समाज के बीच एक पारदर्शी सेतु बनना है। लेकिन आज जब पत्रकारिता दिवस मनाया जा रहा है, तब यह सवाल भी उतना ही प्रासंगिक है कि क्या पत्रकारिता अपने मूल धर्म पर कायम है या फिर बाजार, सत्ता और स्वार्थ के दबावों में उसकी धार कुंद होती जा रही है?

    भारत में पत्रकारिता का इतिहास संघर्ष, साहस और जनसरोकारों से भरा रहा है। स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान अखबार केवल समाचार पत्र नहीं थे, बल्कि जनजागरण और परिवर्तन के हथियार थे। उस दौर के पत्रकारों ने जेल, मुकदमे और आर्थिक कठिनाइयों का सामना किया, लेकिन सच के रास्ते से नहीं हटे। आज परिस्थितियां बदल चुकी हैं, तकनीक ने सूचना को पल भर में लोगों तक पहुंचाने की क्षमता दे दी है, लेकिन इसके साथ ही चुनौतियां भी कई गुना बढ़ गई हैं।

    वर्तमान समय में पत्रकारिता दोराहे पर खड़ी दिखाई देती है। एक ओर निष्पक्ष और जनहितकारी पत्रकारिता करने वाले पत्रकार हैं, जो सीमित संसाधनों के बावजूद समाज के वास्तविक मुद्दों को सामने लाने का प्रयास कर रहे हैं। दूसरी ओर टीआरपी, क्लिक और प्रायोजित एजेंडों की होड़ ने पत्रकारिता के एक हिस्से को खबरों से अधिक प्रचार का माध्यम बना दिया है है। कई बार महत्वपूर्ण जनसमस्याएं हाशिए पर चली जाती हैं और सनसनीखेज विषय मुख्यधारा में छा जाते हैं।

    डिजिटल युग ने पत्रकारिता को नई ताकत दी है। सोशल मीडिया और ऑनलाइन प्लेटफॉर्म ने आम लोगों को भी अपनी बात रखने का अवसर दिया है। लेकिन इसी के साथ फेक न्यूज, आधी-अधूरी सूचनाएं और बिना सत्यापन की खबरें भी तेजी से फैल रही हैं। ऐसे समय में पत्रकार की जिम्मेदारी पहले से कहीं अधिक बढ़ जाती है। पत्रकार का काम केवल खबर देना नहीं, बल्कि तथ्य की पुष्टि करना और समाज को सही दिशा में सोचने के लिए प्रेरित करना भी है।

    पत्रकारिता दिवस पर यह भी स्वीकार करना होगा कि पत्रकारों की परिस्थितियां आसान नहीं हैं। जमीनी स्तर पर काम करने वाले अनेक पत्रकार आर्थिक असुरक्षा, संसाधनों की कमी और विभिन्न प्रकार के दबावों के बीच अपना दायित्व निभाते हैं। कई बार सच लिखने और दिखाने की कीमत उन्हें व्यक्तिगत, सामाजिक और पेशेवर स्तर पर चुकानी पड़ती है। इसके बावजूद लोकतंत्र को जीवंत बनाए रखने में उनकी भूमिका अनिवार्य बनी हुई है।

    आज आवश्यकता इस बात की है कि पत्रकारिता फिर से अपने मूल्यों की ओर लौटे। निष्पक्षता, तथ्यपरकता, जवाबदेही और जनहित को सर्वोच्च प्राथमिकता मिले। पत्रकारों को भी आत्ममंथन करना होगा कि वे किसी विचारधारा, दल या समूह के नहीं, बल्कि जनता के प्रति जवाबदेह हैं। वहीं समाज और सरकार की भी जिम्मेदारी है कि पत्रकारों को स्वतंत्र और सुरक्षित वातावरण उपलब्ध कराया जाए।

    पत्रकारिता दिवस केवल उत्सव का अवसर नहीं, बल्कि संकल्प का दिन है। यह संकल्प कि खबरें बिकें नहीं, सच दबे नहीं और कलम किसी दबाव के आगे झुके नहीं। लोकतंत्र की मजबूती इसी में है कि पत्रकारिता की धार तेज बनी रहे, क्योंकि जब पत्रकारिता कमजोर होती है तो सबसे बड़ा नुकसान जनता और लोकतंत्र दोनों को होता है। सच की यह मशाल निरंतर जलती रहे, यही पत्रकारिता दिवस का वास्तविक संदेश है।

    देश के कई राज्यों में पत्रकार कल्याण योजनाएं प्रभावी

    मध्य प्रदेश में पत्रकार सम्मान निधि, गंभीर बीमारी सहायता, बच्चों की शिक्षा सहायता तथा आवास ऋण पर ब्याज अनुदान जैसी सुविधाएं उपलब्ध हैं।

    छत्तीसगढ़ में पत्रकार कल्याण कोष के माध्यम से दुर्घटना सहायता, गंभीर बीमारी राहत एवं वरिष्ठ पत्रकार सम्मान निधि संचालित की जा रही है।

    बिहार में पात्र पत्रकारों को मासिक पेंशन योजना का लाभ दिया जाता है। वरिष्ठ पत्रकारों को आर्थिक संबल प्रदान करने की व्यवस्था है।

    हरियाणा एवं उत्तराखंड में पत्रकारों के लिए पेंशन, चिकित्सा सहायता एवं आर्थिक सहयोग संबंधी योजनाएं वर्षों से लागू हैं।

    राजस्थान, महाराष्ट्र और गुजरात जैसे राज्यों में भी पत्रकार कल्याण कोष, चिकित्सा सहायता और पारिवारिक सहायता योजनाएं संचालित हैं।

    झारखंड के पत्रकारों की मांग

    पत्रकार संगठनों का कहना है कि अन्य राज्यों की तर्ज पर झारखंड में भी पत्रकार कल्याण कोष, पेंशन योजना, स्वास्थ्य बीमा, दुर्घटना सहायता और आवास सहायता जैसी योजनाएं लागू की जानी चाहिए, ताकि जमीनी स्तर पर कार्यरत पत्रकारों को सामाजिक सुरक्षा मिल सके।

    “लोकतंत्र के चौथे स्तंभ को मजबूत करने के लिए पत्रकारों की सुरक्षा और सम्मान सुनिश्चित करना समय की आवश्यकता है।”

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