संसद का बजट सत्र: उपलब्धियां, विवाद और अधूरे सवाल
देवानंद सिंह
संसद का हालिया बजट सत्र कई मायनों में असाधारण रहा। यह सत्र न केवल कुछ दुर्लभ संसदीय घटनाओं का साक्षी बना, बल्कि कई महत्वपूर्ण विधायी प्रयासों के अधूरे रह जाने के कारण भी चर्चा में रहा। उपलब्धियों और विफलताओं के इस मिश्रण ने भारतीय लोकतंत्र की कार्यप्रणाली पर नए सिरे से विचार करने की आवश्यकता को रेखांकित किया है।
सबसे पहले बात उस महत्वपूर्ण राजनीतिक घटनाक्रम की, जिसमें महिला आरक्षण से जुड़े संविधान (131वां) संशोधन विधेयक, 2026 को लोकसभा में पारित नहीं कराया जा सका। यह विधेयक लंबे समय से राजनीतिक विमर्श का केंद्र रहा है और इसे महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी बढ़ाने की दिशा में ऐतिहासिक कदम माना जा रहा था। लेकिन व्यापक बहस और विपक्ष के विरोध के बीच यह विधेयक आवश्यक समर्थन जुटाने में विफल रहा। इसके साथ ही परिसीमन विधेयक और संघ राज्य विधि (संशोधन) विधेयक को भी सरकार ने आगे नहीं बढ़ाया, जो यह दर्शाता है कि संसदीय सहमति के बिना बड़े सुधारों को आगे ले जाना कितना कठिन है।
इस सत्र की एक और उल्लेखनीय घटना रही कि राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव लोकसभा में प्रधानमंत्री के जवाब के बिना ही पारित हो गया। संसदीय परंपराओं में यह एक असामान्य स्थिति मानी जाती है, क्योंकि आमतौर पर प्रधानमंत्री इस चर्चा का जवाब देकर सरकार का पक्ष रखते हैं। हालांकि राज्यसभा में प्रधानमंत्री ने जवाब दिया, लेकिन लोकसभा में यह अनुपस्थिति संसदीय संवाद की गुणवत्ता पर सवाल उठाती है।
लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला के खिलाफ लाया गया अविश्वास प्रस्ताव भी इस सत्र का एक अहम पड़ाव रहा। इस प्रस्ताव पर चर्चा होना अपने आप में दुर्लभ है, क्योंकि अध्यक्ष पद आमतौर पर दलगत राजनीति से ऊपर माना जाता है। हालांकि अंततः यह प्रस्ताव खारिज हो गया, लेकिन इस पूरी प्रक्रिया ने यह संकेत जरूर दिया कि संसद के भीतर राजनीतिक तनाव किस स्तर तक पहुंच चुका है। उल्लेखनीय है कि इस दौरान बिरला ने स्वयं सदन की कार्यवाही का संचालन नहीं किया, जो संसदीय मर्यादा के अनुरूप एक संतुलित कदम माना जा सकता है।
राज्यसभा में एक सकारात्मक और ऐतिहासिक पहलू भी देखने को मिला, जब मनोनीत सदस्य हरिवंश को निर्विरोध उपसभापति चुना गया। यह पहली बार हुआ कि किसी मनोनीत सदस्य को इस पद की जिम्मेदारी सौंपी गई। इससे यह संकेत मिलता है कि योग्यता और अनुभव को महत्व देने की परंपरा अब भी संसदीय व्यवस्था में जीवित है, भले ही व्यापक राजनीतिक वातावरण में टकराव का स्वर अधिक प्रबल क्यों न हो।
सत्र के समापन से ठीक पहले ‘वंदे मातरम’ के पूरे छह अंतरों का रिकॉर्डेड गान बजाया जाना भी एक प्रतीकात्मक लेकिन उल्लेखनीय बदलाव रहा। यह कदम जहां एक ओर सांस्कृतिक विरासत के प्रति सम्मान को दर्शाता है, वहीं यह भी दिखाता है कि संसद अपने परंपरागत स्वरूप में नए प्रयोगों के लिए तैयार है।
हालांकि इन सभी घटनाओं के बीच सबसे बड़ा प्रश्न यही है कि क्या यह सत्र अपने मूल उद्देश्य विधायी कार्य और नीति निर्माण में कितना सफल रहा? यदि महिला आरक्षण जैसे महत्वपूर्ण विधेयक पारित नहीं हो पाते, तो यह केवल एक विधायी विफलता नहीं बल्कि राजनीतिक सहमति की कमी का भी संकेत है। लोकतंत्र में बहस और असहमति स्वाभाविक है, लेकिन जब वे निर्णय प्रक्रिया को ठहराव की ओर ले जाएं, तो यह चिंताजनक हो जाता है।
सत्र की अवधि और उसके संचालन पर भी सवाल उठे। पहले से निर्धारित कार्यक्रम में बदलाव, बीच में स्थगन और अंततः अनिश्चितकाल के लिए स्थगन—ये सभी संकेत देते हैं कि संसदीय कार्यवाही को अधिक सुव्यवस्थित और पूर्वानुमेय बनाने की जरूरत है। संसद केवल राजनीतिक टकराव का मंच नहीं, बल्कि नीतिगत निर्णयों का केंद्र भी है, और इसकी कार्यक्षमता पर देश की शासन प्रणाली निर्भर करती है।
इस बजट सत्र ने यह स्पष्ट कर दिया है कि भारतीय संसद में परंपरा और परिवर्तन, सहमति और टकराव, उपलब्धि और असफलता—सभी साथ-साथ चल रहे हैं। यह लोकतंत्र की स्वाभाविक प्रक्रिया का हिस्सा है, लेकिन संतुलन बनाए रखना सबसे बड़ी चुनौती है। आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि क्या राजनीतिक दल इन अनुभवों से सीख लेकर अधिक रचनात्मक और परिणामोन्मुखी दृष्टिकोण अपनाते हैं, या फिर संसद में गतिरोध की स्थिति बनी रहती है।
अंततः, यह सत्र इतिहास में दर्ज तो हो गया है, लेकिन यह इतिहास केवल उपलब्धियों का नहीं, बल्कि उन अधूरे सवालों का भी है, जिनका जवाब देश की जनता आने वाले सत्रों में तलाशेगी।

