तुम स्वयं अपना निर्माण करो
अपनी प्रतिध्वनि को सुनकर तुम,
अंतर् शक्ति का ध्यान धरो,
अपने पथ का सम्मान करो ,
तुम स्वयं अपना निर्माण करो।
हो अशांत विकल ये मन फिर भी ,
हो अश्रुपूरित चेतन फिर भी ,
बाधाओं का प्रतिकार करो,
तय लक्ष्यों का अनुसंधान करो
तुम स्वयं अपना निर्माण करो।
ये राष्ट्र तुम्हारा परिचय है ,
आत्मिक शक्ति का संचय है ,
तुम दो समाज को नयी दिशा,
जनगण हित में प्रतिदान करो।
तुम स्वयं अपना निर्माण करो।
हो क्षितिज तेरा धानी आंचल,
संवेदित ह्रदय गंगा का जल,
हो जय नारी सामर्थ्य की अब,
ऐसा अनुपम कीर्तिमान गढो।
तुम स्वयं अपना निर्माण करो।
:– डॉ कल्याणी कबीर

