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    Home » क्या अमेरिका में बंद हो जाएगा दुनिया का दवाख़ाना ?
    Breaking News Headlines जमशेदपुर संथाल परगना संपादकीय सरायकेला-खरसावां

    क्या अमेरिका में बंद हो जाएगा दुनिया का दवाख़ाना ?

    Sponsored By: सोना देवी यूनिवर्सिटीSeptember 28, 2025No Comments5 Mins Read
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    कालियाचक घटना
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    देवानंद सिंह
    भारत को वर्षों से दुनिया का दवाख़ाना कहा जाता है, जो केवल सांकेतिक नहीं बल्कि वैश्विक स्वास्थ्य सुरक्षा के लिए अत्यंत व्यावहारिक महत्व रखता है। भारत की जेनेरिक दवाइयों ने अफ्रीका से लेकर अमेरिका तक, करोड़ों ज़िंदगियों को सस्ती, सुलभ और प्रभावशाली स्वास्थ्य सेवाएं दी हैं, लेकिन अब, अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की नई नीति ने इस वैश्विक भूमिका पर संकट की स्थिति ला दी है।
    वित्त वर्ष 2023-24 में भारत ने कुल 27.85 अरब डॉलर के दवा और फार्मास्युटिकल उत्पादों का निर्यात किया, इसमें से अकेले अमेरिका को 9 अरब डॉलर का निर्यात हुआ, यानी कुल निर्यात का लगभग एक तिहाई। अमेरिका में जितनी जेनेरिक दवाइयों का इस्तेमाल होता है, उनमें से लगभग 47 प्रतिशत भारत से आयात की जाती हैं।

     

    ये आंकड़े केवल व्यापारिक आंकड़े नहीं हैं, बल्कि अमेरिका के हेल्थकेयर सिस्टम के लिए एक मजबूत सहारा हैं। आईक्यूवीआईए के अनुसार, 2022 में भारतीय दवाओं के कारण अमेरिका की स्वास्थ्य प्रणाली ने 220 अरब डॉलर की बचत की थी। एक दशक में यह आंकड़ा 1.3 ट्रिलियन डॉलर तक पहुंच गया।

     

    डोनाल्ड ट्रंप ने हाल ही में घोषणा की है कि अमेरिका एक अक्‍टूबर से ब्रांडेड और पेटेंटेड दवाइयों पर 100 प्रतिशत टैरिफ़ लगाएगा। यह फैसला उस नीति का हिस्सा है, जिसे ट्रंप मेक अमेरिका ग्रेट अगेन के नाम से प्रचारित करते हैं, यानी अमेरिकी कंपनियों को घरेलू उत्पादन के लिए प्रेरित किया जा रहा है, लेकिन समस्या वहीं से शुरू होती है, जहां ब्रांडेड जेनेरिक दवाओं को लेकर भ्रम है। भारत की जेनेरिक दवा इंडस्ट्री में, ब्रांडेड जेनेरिक दवाइयों की एक बड़ी हिस्सेदारी है, यानी ऐसी दवाएं, जो पेटेंट की मियाद खत्म होने के बाद बनाई जाती हैं, लेकिन कंपनी के ब्रांड नाम से बिकती हैं, जैसे कि क्रोसिन या नाइस।

     

    मेडिकल क्षेत्र से जुड़े विश्‍लेषकों का कहना है कि अमेरिकी कानूनों में ब्रांडेड जेनेरिक जैसी कोई स्पष्ट अवधारणा नहीं है। अमेरिका में अक्सर ऐसी दवाओं को भी पेटेंटेड ही माना जाता है। यदि, ऐसा हुआ तो भारत की कई बड़ी फार्मा कंपनियों पर सीधा असर पड़ेगा, क्योंकि वे ब्रांडेड जेनेरिक दवाएं अमेरिका में बड़े पैमाने पर बेचती हैं।

     

    अमेरिका में कई प्रमुख बीमारियों, जैसे कि हाइपरटेंशन, डिप्रेशन और बर्थ कंट्रोल के इलाज में इस्तेमाल होने वाली दवाओं का उत्पादन मुख्यतः भारत की कंपनियों, जैसे ग्लेनमार्क और ल्यूपिन, द्वारा किया जाता है। इन दवाओं पर टैरिफ़ लगाने का मतलब है अमेरिका में दवाइयों का महंगा होना, और भारत की कंपनियों के लिए एक बड़ा बाज़ार सिकुड़ जाना।

     

    इसके अलावा, भारत के पास अमेरिका जैसी सब्सिडी देने या डॉलर की अनंत आपूर्ति नहीं है। श्रम लागत में भारी अंतर है। भारत में दवाइयों का उत्पादन अमेरिका की तुलना में कहीं अधिक सस्ता है। अगर, ट्रंप चाहते हैं कि भारतीय कंपनियां अमेरिका में आकर उत्पादन करें, तो लागत में इतना इज़ाफा होगा कि जेनेरिक की सबसे बड़ी विशेषता सामर्थ्य ही खत्म हो जाएगी।
    विशेषज्ञ इस टैरिफ़ को सीधे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ‘मेक इन इंडिया’ नीति के ख़िलाफ़ देखती हैं। उनके अनुसार, यह टकराव दो वैश्विक विचारधाराओं का है, एक जिसमें विकासशील देश वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला का हिस्सा बनते हैं, और दूसरा जिसमें एक विकसित देश सब कुछ अपने भीतर सीमित करना चाहता है। ट्रंप के फैसलों की व्यावसायिक नहीं बल्कि राजनीतिक व्याख्या भी जरूरी है। ‘मेक अमेरिका ग्रेट अगेन’ की विचारधारा को जीवित रखने के लिए ट्रंप वैश्विक टकरावों को एक उपकरण की तरह इस्तेमाल करते हैं। पहले चीन उनके निशाने पर था, अब भारत है।
    चीन ने ट्रंप की मनमानी के सामने कड़े जवाब दिए, डेटा साझा करना रोका, जवाबी टैरिफ़ लगाए। भारत ने अब तक अपेक्षाकृत संयम बरता है, लेकिन डेटा फ्री फ्लो जैसी व्यवस्थाएं, जो अमेरिका को टेक सेक्टर में समर्थन देती हैं, उन्हें भारत अपनी रणनीति में शामिल कर सकता है।
    रणनीतिक वार्ता और लॉबिंग पर विशेष जोर दिया जाए। अमेरिका में भारतीय लॉबी बहुत प्रभावशाली है। भारत को इस संकट को केवल ट्रेड मुद्दा न मानकर इसे हेल्थकेयर सहयोग का विषय बनाकर पेश करना चाहिए। अमेरिका को दिखाना होगा कि इस टैरिफ से उसे खुद को कितना नुकसान होगा। साझे उत्पादन का प्रस्ताव दिया जाए। भारत अमेरिकी कंपनियों के साथ सह-उत्पादन का प्रस्ताव दे सकता है। इससे ट्रंप के ‘मेक इन अमेरिका’ की कुछ हद तक पूर्ति होगी, और भारत का उत्पादन भी प्रभावित नहीं होगा। दबाव का विरोध किया जाए, अमेरिका भारत पर पेटेंट अवधि को बढ़ाने का दबाव डाल रहा है, जिससे जेनेरिक उत्पादन और अधिक मुश्किल हो जाएगा। भारत को इस मुद्दे पर वैश्विक दक्षिण के साथ मिलकर संयुक्त मोर्चा बनाना होगा, और उभरते बाज़ारों में विस्तार किया जाए, अगर, अमेरिका का बाज़ार चुनौतीपूर्ण हो जाए, तो भारत को अफ्रीका, लैटिन अमेरिका और एशिया के अन्य हिस्सों में अपनी पकड़ और मजबूत करनी होगी। क्या ट्रंप भारत की फार्मा ताक़त पर चोट करेंगे? यह एक अहम सवाल है। इस सवाल का उत्तर संभावना है, लेकिन परिणाम निश्चित नहीं है। ट्रंप भारत को दबाव में लाने की कोशिश कर सकते हैं, लेकिन भारत की फार्मा इंडस्ट्री अब वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला की अपरिहार्य कड़ी बन चुकी है। ट्रंप का यह दांव दोधारी तलवार हो सकता है, इससे अमेरिका में दवाइयों की कीमतें बढ़ेंगी, स्वास्थ्य सेवाओं पर भार बढ़ेगा, और भारत जैसी विश्वसनीय सप्लाई चेन को खोकर अमेरिका खुद को असुरक्षित बना सकता है।
    भारत के लिए यह वक्त पीछे हटने का नहीं, बल्कि रणनीतिक प्रतिक्रिया देने का है। जेनेरिक दवाइयों को वैश्विक सार्वजनिक वस्तु के रूप में प्रस्तुत करते हुए भारत को यह दिखाना होगा कि वह केवल एक दवा निर्यातक नहीं, बल्कि वैश्विक स्वास्थ्य का अभिन्न अंग है। अगर, भारत ‘दुनिया का दवाख़ाना’ बना है, तो इसका कारण केवल सस्ते श्रम नहीं, बल्कि विश्वसनीयता, गुणवत्ता और मानवीय दृष्टिकोण है, और यह कोई भी टैरिफ़ बदल नहीं सकता।

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