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    Home » विकास के आधुनिक मॉडल ने आदिवासी और प्रकृति के रिश्ते के सन्तुलन को बिगाड़ दिया है:हेमन्त सोरेन
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    विकास के आधुनिक मॉडल ने आदिवासी और प्रकृति के रिश्ते के सन्तुलन को बिगाड़ दिया है:हेमन्त सोरेन

    Nizam KhanBy Nizam KhanJanuary 17, 2020No Comments7 Mins Read
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    *विकास के आधुनिक मॉडल ने आदिवासी और प्रकृति के रिश्ते के सन्तुलन को बिगाड़ दिया है–हेमन्त सोरेन*

    *रांची के ऑड्रे हाउस में तीन दिवसीय “आदि-दर्शन” अंतरराष्ट्रीय सेमिनार का हुआ शुभारंभ*
    ======================
    *जनजातीय दर्शन (Tribal philosophy) पर पहली बार अंतराराष्ट्रीय सेमिनार (International Seminar) का आयोजन हुआ*
    ======================
    *राज्यपाल श्रीमती द्रौपदी मुर्मू एवं मुख्यमंत्री श्री हेमंत सोरेन ने इस अंतरराष्ट्रीय सेमिनार में उपस्थित लोगों को संबोधित किया*
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    *★ट्राइबल दर्शन सबसे अच्छा और सबसे बड़ा दर्शन*

    *– द्रौपदी मुर्मू, राज्यपाल झारखंड*
    ======================
    *★ विकास के आधुनिक मॉडल ने आदिवासी और प्रकृति के रिश्ते के सन्तुलन को बिगाड़ दिया है*

    *★”आदि-दर्शन” राज्य के आदिवासी समुदायों के विकास के लिए मील का पत्थर साबित होगा*

    *– हेमंत सोरेन, मुख्यमंत्री*
    =======================
    राज्यपाल श्रीमती द्रौपदी मुर्मू ने “आदि-दर्शन” सेमिनार को संबोधित करते हुए कहा कि भारत में 9 प्रकार के दर्शन हैं। इन दर्शनों में ट्राइबल दर्शन सबसे अच्छा और सबसे बड़ा दर्शन है। आदिवासी समुदाय के लोग प्रकृति की पूजा करते हैं। साथ ही, साथ पंचतत्व की पूजा करते हैं। अभी तक जनजातीय समुदायों के अध्ययन के विषय उनकी बाहरी गतिविधियों, बाह्य जगत से उनके सम्बन्धों, अपने समाज में उनके व्यवहारों तक ही सीमित रहे हैं। विशेष तौर पर मानवशास्त्री आदिवासी समाज के धार्मिक अनुष्ठानों, पूजा पद्धतियों, जन्म से मृत्यु तक के संस्कारों, सामाजिक संगठनों, पर्व-त्यौहारों, किस्से-कहानियों-गीतों, तथा नृत्य की शैलियों पर ही अध्ययन करते आ रहे हैं। आशा है कि ऐसे आयोजन से ‘आदिवासी दर्शन’ दर्शनशास्त्र की भारतीय शाखा में अपनी महत्वपूर्ण जगह बनाने में सफल होगा।

    राज्यपाल श्रीमती द्रौपदी मुर्मू ने कहा कि आप सभी जानते हैं कि हमारे देश की जनसंख्या का एक बड़ा हिस्सा जनजातियों का है। अति प्राचीन काल से ही जनजातीय समुदाय भारतीय सभ्यता एवं संस्कृति के अभिन्न अंग रहे हैं। उन्होंने कहा कि जनजातियों की कला, संस्कृति, लोक साहित्य, परंपरा एवं रीति-रिवाज़ समृद्ध रही है। जनजातीय गीत एवं नृत्य बहुत मनमोहक है। ये प्रकृति प्रेमी हैं। विभिन्न अवसरों पर हम यह देखते हैं कि जनजातियों के गायन और नृत्य उनके समुदाय तक ही सीमित नहीं हैं, सभी के अंदर उस पर झूमने के लिए इच्छा जगा देती है।

    *आदिवासी समुदाय के समग्र विकास के लिए मील का पत्थर होगा यह कॉन्फ्रेंस–हेमन्त सोरेन*

    इस अवसर पर *मुख्यमंत्री श्री हेमन्त सोरेन* ने कहा कि जनजातीय दर्शन एक बहुत बड़ा विषय है। झारखंड आदिवासी बहुल प्रदेश है। देश और हमारे राज्य में बहुत सारे शोध निरंतर होते रहे हैं परंतु मैं समझता हूं कि जहां तक आदिवासी दर्शन की बात है कहीं ना कहीं यह अपने आप में एक बहुत बड़ा समूह है। आदिवासी दर्शन को समझना अथवा शोध करना एक बड़ी चुनौती भी है। मुझे पूरा विश्वास है कि रांची के ऐतिहासिक ऑड्रे हाउस में तीन दिवसीय अंतर्राष्ट्रीय “आदि-दर्शन” सेमिनार का आयोजन राज्य के आदिवासी समुदाय के समग्र विकास के लिए मील का पत्थर साबित होगा।

    *आदिवासी समुदायों की 5 हजार संस्कृतियां हैं और 40 हजार भाषाएं*

    मुख्यमंत्री श्री हेमंत सोरेन ने कहा कि आदिवासी दर्शन विषय पर पूरे विश्व में शोध कार्य चल रहे हैं। यह शोध कार्य किस तरीके से चल रहे हैं इसकी भी चर्चा निरंतर होती रही है। मुख्यमंत्री ने कहा कि जहां तक मुझे जानकारी है कि पूरे विश्व के लगभग 90 देशों में 37 करोड़ आदिवासी रहते हैं। इन समुदायों की 5 हजार संस्कृतियां हैं और 40 हजार भाषाएं समाहित हैं जो सामान्य दिनचर्या में बोली जाती हैं। मुख्यमंत्री ने कहा कि पूरे विश्व की आबादी का 5% यानी कि पूरे विश्व में 800 करोड़ की आबादी में लगभग 40 करोड़ आदिवासी समूह के लोग शामिल हैं। मुख्यमंत्री श्री हेमंत सोरेन ने कहा कि आज यह एक बड़ी विडंबना है कि पूरे विश्व की गरीबी में 15% हिस्सेदारी आदिवासियों की ही है। आखिर ऐसा क्यों है? यह शोध का ही विषय है।

    *विकास के आधुनिक मॉडल ने आदिवासी और प्रकृति के रिश्ते के सन्तुलन को बिगाड़ दिया है*

    मुख्यमंत्री श्री हेमंत सोरेन ने कहा कि विकास का आधुनिक मॉडल ने आदिवासी और प्रकृति के रिश्ते के सन्तुलन को बिगाड़ दिया है। संसाधन की ग्लोबल भूख से अधिकतर आदिवासी पहचान को ही आघात पहुंचा है। विश्व में कई देशों ब्राज़ील, ऑस्ट्रेलिया, मलेशिया आदि ने बड़े पैमाने पर आदिवासियों को अपनी प्रकृति-संस्कृति से अलग किया है और इस समुदाय को पलायन का रास्ता अपनाना पड़ा है। उन्होंने कहा कि वर्तमान में पूरा विश्व जिस आधुनिकीकरण विकास के मॉडल को अपनाया है क्या आदिवासी समूह इस विकास के पैमाने के साथ साथ चल पा रहा है यह एक बहुत ही बड़ा सवाल है?

    *आदिवासी समूह को जल, जंगल, जमीन से अलग किया गया*

    मुख्यमंत्री श्री हेमंत सोरेन ने मुख्यमंत्री ने मलेशिया और ब्राजील का उदाहरण देते हुए कहा कि मलेशिया में आदिवासी समुदाय के लोग मछलियां पकड़ कर अपना जीवन यापन करते थे साथ ही संस्कृति के साथ-साथ लंबी यात्रा करते आ रहे थे परंतु उन्हें शोषित और पीड़ित किया गया। मुख्यमंत्री ने कहा कि ब्राजील के आदिवासी समुदाय जिन्हें गौरानी समूह के रूप में जाना जाता था यह लोग वहां पर गन्ने की खेती करते थे परंतु यह भी शोषित हुए और इन्हें भी पलायन करना पड़ा। मुख्यमंत्री श्री हेमंत सोरेन ने कहा कि दुनिया में आत्महत्या करने वालों में सबसे अधिक आदिवासी समूह के ही लोग रहे हैं। मुख्यमंत्री श्री हेमंत सोरेन ने कहा कि झारखंड में खनिज संपदा के उत्खनन के लिए आदिवासी समूह को जल, जंगल, जमीन से अलग किया गया है। आदिवासी समुदाय के जमीनों को छीनने का भी काम किया जा रहा है। झारखंड के आदिवासी समूहों को कॉरपोरेट के नाम पर भी छला गया है। उद्योग के क्षेत्र में जितनी लाभ आदिवासी समाज को मिलनी थी वह लाभ नहीं मिल पाया।

    *आदिवासी समुदायों के गिरते जीवन स्तर पर भी हमें चिंतन करने की आवश्यकता*

    मुख्यमंत्री श्री हेमंत सोरेन ने कहा कि आदिवासी समुदाय एक ऐसा समूह है जो अपनी परंपरा-संस्कृति को अपने सीने से लगा कर सदैव चलता रहा है। उन्होंने कहा कि हड़प्पा संस्कृति और मोहनजोदड़ो की खुदाई में पाए गए बर्तन में आज भी आदिवासी समुदाय के लोग खाना खाते हैं। उन्होंने कहा कि आदिवासी समुदायों के गिरते जीवन स्तर पर भी हमें चिंतन करने की आवश्यकता है। मुख्यमंत्री ने कहा कि देश में 1951 ईस्वी तक लगभग 30 से 35% आदिवासी हुआ करते थे आज आदिवासियों की संख्या मात्र 26% रह गई है। यह अपने आप में एक बहुत ही गंभीर विषय है कि आखिर आदिवासी समुदाय के लोगों की संख्या कैसे घटी? इस पर शोध और चिंतन नितांत आवश्यक है।

    *प्राकृतिक संतुलन को बनाए रखने में आदिवासी समुदाय की भूमिका अहम*

    मुख्यमंत्री श्री हेमंत सोरेन ने कहा कि आज पूरा विश्व ग्लोबल वार्मिंग को लेकर चिंतित है। उन्होंने कहा कि प्रकृति के बदलाव के वजह से जो परिस्थिति उत्पन्न हुई है यह काफी चिंतनीय है। प्राकृतिक संतुलन को बनाए रखने में आदिवासी समुदाय की भूमिका सबसे अहम रही है और आगे भी रहेगी। ग्लोबल वार्मिंग जैसी चीजों से बचाव आदिवासी समाज से बेहतर और कोई नहीं कर सकता है। मुख्यमंत्री ने कहा कि हमारे देश और राज्य में प्राकृतिक सौंदर्य की अपनी पहचान है। इस प्राकृतिक सौंदर्य को विकास की व्यवस्था के नाम पर ईंट, कंक्रीट और पत्थर से नुकसान नहीं पहुंचाना हम सभी का कर्तव्य होना चाहिए।

    *मैं भी आदिवासी समाज से आता हूं मेरे मन में भी बहुत संवेदनाएं हैं*

    मुख्यमंत्री श्री हेमंत सोरेन ने कहा कि मैं भी इसी आदिवासी समाज से आता हूं मेरे मन में भी बहुत संवेदनाएं हैं। आदिवासी परंपरा संस्कृति को अच्छा रखने के लिए सरकार भी इस समुदाय के साथ निरंतर कंधे से कंधा मिलाकर चलेगी। मुख्यमंत्री ने विश्वास जताया कि डॉ राम दयाल मुण्डा ट्राइबल वेलफेयर रिसर्च इंस्टीट्यूट और अनुसूचित जनजाति, अनुसूचित जाति, अल्पसंख्यक एवं पिछड़ा वर्ग कल्याण विभाग के सौजन्य से आयोजित इस तीन दिवसीय अंतरराष्ट्रीय सेमिनार आदिवासी समुदाय के विकास के लिए बहुत ही हितकर और सकारात्मक होगा। मुख्यमंत्री ने इस आयोजन के लिए आयोजनकर्ताओं को बधाई एवं शुभकामनाएं दी।

    *19 जनवरी तक चलने वाले इस सेमिनार में 12 देशों से आदिवासी दर्शनशास्त्र के विशेषज्ञ और शोधकर्ता हिस्सा ले रहे हैं*

    *इस अवसर पर डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ सत्यनारायण मुंडा, अनुसूचित जनजाति, अनुसूचित जाति, अल्पसंख्यक एवं पिछड़ा वर्ग कल्याण विभाग की सचिव श्रीमती हिमानी पांडे, राम दयाल मुण्डा ट्राइबल वेलफेयर रिसर्च इंस्टीट्यूट के निदेशक श्री रणेंद्र कुमार, लेखक एवं आदिवासी दर्शन के जानकार श्री महादेव टोप्पो, रांची यूनिवर्सिटी के टीआरएल डिपार्टमेंट के प्राध्यापक प्रो हरि उरांव, सिंहभूम आदिवासी समाज के श्री दामोदर सिंकू, सिंहभूम आदिवासी समाज के श्री दुंबे दिग्गी, शांति खलखो, प्रो. अभय सागर मिंज, डॉ. संतोष किड़ो, लेखक श्री संजय बसु मल्लिक और जनजातीय शोध संस्थान के उप निदेशक श्री चिंटू दोराईबुरु आदि गणमान्य लोग उपस्थित थे।*

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