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    Home » टैरिफ आर्थिक युद्ध नहीं आत्मनिर्भर शांति का रास्ता बने
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    टैरिफ आर्थिक युद्ध नहीं आत्मनिर्भर शांति का रास्ता बने

    News DeskBy News DeskAugust 1, 2025No Comments7 Mins Read
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    ललित गर्ग

    जब किसी वैश्विक ताक़त के शिखर पर बैठा नेता ‘व्यापार’ को भी ‘सौदेबाज़ी’ और ‘दबाव नीति’ का औज़ार बना ले, तब यह न केवल वैश्विक अर्थव्यवस्था को झकझोर देता है, बल्कि अंतरराष्ट्रीय संबंधों के आधारभूत सिद्धांतों को भी चुनौती देता है। अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भारत पर 25 प्रतिशत टैरिफ लगाकर ऐसा ही एक आर्थिक आघात पहुँचाया है। इस टैरिफ का लक्ष्य स्पष्ट है, भारतीय उत्पादों की प्रतिस्पर्धा को बाधित करना और अमेरिकी वर्चस्व की पुनः स्थापना करना। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के दुनिया की तीसरी अर्थव्यवस्था बनने के लक्ष्य एवं भारत की उभरती अर्थव्यवस्था में अमेरिका की ‘ट्रंपीय’ दादागिरी, एवं टैरिफ का तात्कालिक और दीर्घकालिक प्रभाव कितना क्या असर दिखायेगी, यह भविष्य के गर्भ में हैं। लेकिन इस सन्दर्भ में भारत सरकार की दृढ़ता सराहनीय है। अमेरिका हमारा सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार रहा है, दोनों का द्विपक्षीय व्यापार 2024 में 190 अरब डॉलर तक पहुंच गया था। ट्रंप और मोदी ने इस आंकड़े को दोगुना से भी ज्यादा 500 अरब डॉलर करने का लक्ष्य रखा था, लेकिन उस लक्ष्य पर सवालिया निशान लग गए हैं। ऐसे में, भारतीय कंपनियों को बहुत संभलकर अपने लिए नए बाजार खोजने व बढ़ाने चाहिए।
    भारत की अर्थव्यवस्था अब दुनिया की सबसे तेज़ गति से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में है। मेक इन इंडिया, स्टार्टअप इंडिया, डिजिटल इंडिया जैसे अभियानों ने भारत को उत्पादन और नवाचार का नया केंद्र बनाया है। भारत का टेक्सटाइल, स्टील, ऑटो पार्ट्स और आईटी सेवा क्षेत्र वैश्विक बाज़ार में निरंतर अपनी पकड़ मज़बूत कर रहे हैं। ऐसे में अमेरिका द्वारा टैरिफ थोपना भारत की बढ़ती वैश्विक प्रतिस्पर्धा से उपजे भय का संकेत है। लेकिन यह निर्णय केवल व्यापारिक नहीं, बल्कि रणनीतिक भी है। ट्रंप प्रशासन हमेशा से ही व्यापार संतुलन के मुद्दे को राष्ट्रीय गौरव से जोड़कर देखता रहा है। ‘अमेरिका फर्स्ट’ की नीति का मुख्य हथियार रहा है, दूसरों को पीछे धकेलकर अमेरिका को आगे लाना। यह एकतरफा सोच व्यापार के मूल्यों और साझेदारी की भावना को कमजोर करती है। व्यापार समझौते पर 1 अगस्त की समय सीमा तक दोनों देशों के बीच जारी बातचीत किसी नतीजे पर न पहुंचने का बड़ा कारण भारत का अमेरिका की शर्तों पर समझौता करने के लिए तैयार नहीं होना रहा है। उसे आगे भी तैयार नहीं होना चाहिए। इसका कोई मतलब नहीं कि भारत अमेरिका से ऐसा व्यापार समझौता कर ले, जो केवल उसके हित में हो। इस तरह के समझौते तो तभी हो पाते हैं, जब दोनों पक्षों के हित सधते हैं। भारत को अपने हितों की रक्षा के लिए अडिग रहना चाहिए और यह स्पष्ट करने में संकोच भी नहीं करना चाहिए कि वह अमेरिकी राष्ट्रपति के अनुचित दबाव के आगे झुकने वाला नहीं। भारत को ट्रंप के मनमाने फैसलों से डरने की आवश्यकता इसलिए भी नहीं, क्योंकि वे अपने फैसलों से पीछे हटने और उन्हें पलटने के लिए जाने जाते हैं। उनके इस रवैये के कारण उनकी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर फजीहत भी हो रही है। उन्हें यह समझ आ जाए तो अच्छा कि आज का भारत पहले वाला भारत नहीं है और अमेरिका का भी प्रभाव पहले जैसा नहीं रहा।
    डोनाल्ड ट्रंप की नीति अक्सर ‘दबाव डालो और झुकावो’ पर आधारित रही है। चीन, यूरोप, मैक्सिको के साथ भी ट्रंप की व्यापार नीति टकरावपूर्ण रही है। लेकिन भारत, ऐतिहासिक रूप से संतुलन साधने वाली कूटनीति में विश्वास करता रहा है। भारत ने कई बार वार्ता के माध्यम से समझौते की दिशा में पहल की, लेकिन ट्रंप की आक्रामक नीति और ‘डीलमेकिंग’ की व्यक्तिगत शैली ने किसी संतुलन को बनने नहीं दिया। भारत पर लगाया गया 25 प्रतिशत टैरिफ न केवल आर्थिक रूप से अनुचित है, बल्कि यह उभरते राष्ट्रों के आत्मनिर्भर बनने के अधिकार का भी हनन है। यह नव-उपनिवेशवाद का नया रूप है, जहंँ आर्थिक हथियारों से शक्तिशाली राष्ट्र, विकासशील देशों को नियंत्रित करना चाहते हैं। राष्ट्रपति ने भारत पर टैरिफ बढ़ाने और जुर्माना लगाने की जो घोषणा की, वह उनकी दबाव की राजनीति का ही हिस्सा है। इस राजनीति की पोल खुल चुकी है। अच्छा होगा कि इसे देश के विपक्षी दल भी समझें। इसलिए और भी समझें कि संसद में आपरेशन सिंदूर पर चर्चा के दौरान प्रधानमंत्री मोदी ने साफ तौर पर कहा कि सैन्य कार्रवाई को स्थगित किए जाने के सिलसिले में विश्व के किसी भी नेता की कहीं कोई भूमिका नहीं। स्पष्ट है कि भारत-पाकिस्तान के बीच सैन्य कार्रवाई को कथित तौर पर रोकने का ट्रंप का दावा फर्जी है। वास्तव में इसी कारण वे अपने इस थोथे दावे को बार-बार दोहरा रहे हैं।
    आज का भारत न केवल एक विशाल बाज़ार है, बल्कि एक नवाचारशील शक्ति भी है। दुनिया की सबसे बड़ी युवा जनसंख्या, तेज़ी से बढ़ती डिजिटल अर्थव्यवस्था, और विविधता से समृद्ध उत्पादन क्षमता भारत को वैश्विक आर्थिक शक्ति बनने की ओर अग्रसर कर रही है। भारत अब “निर्भरता” की नीति से निकलकर “आत्मनिर्भरता” की ओर बढ़ रहा है। ट्रंप के टैरिफ का प्रभाव सीमित और अस्थायी होगा, लेकिन भारत की आर्थिक विकास यात्रा दीर्घकालिक और दृढ़ है। भारत के लिए यह चुनौती अवसर में बदलने का समय है, नए बाज़ारों की तलाश, घरेलू उत्पादन को और सशक्त बनाना, और वैश्विक साझेदारियों को नए रूप में ढालना। ट्रंप की दादागिरी भारत को झुका नहीं सकती। बल्कि यह भारत को और मज़बूत और आत्मनिर्भर बनने की प्रेरणा दे सकती है। यह समय है जब भारत को अपने उत्पादन, नवाचार, निर्यात और कूटनीति को और धार देने की आवश्यकता है। हमें यह समझना होगा कि शक्ति का उत्तर शक्ति से नहीं, दूरदृष्टि और नीति से दिया जाना चाहिए। ट्रंप का टैरिफ एक चुनौती है, लेकिन भारत की आत्मा में संघर्ष से जीतने का इतिहास है। हमने हर संकट को अवसर में बदला है, और इस बार भी हम यही करेंगे, न केवल अपनी अर्थव्यवस्था के लिए, बल्कि वैश्विक आर्थिक संतुलन के लिए भी।
    प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का आर्थिक चिंतन मूलतः ‘आत्मनिर्भर भारत’, ‘विकास के साथ विश्वास’, और ‘समान साझेदारी’ के सिद्धांतों पर आधारित रहा है। वे वैश्विक मंच पर भारत को एक समानाधिकार संपन्न राष्ट्र के रूप में प्रस्तुत करते हैं, न कि किसी बड़े राष्ट्र की कृपा पर चलने वाली व्यवस्था के रूप में। जब डोनाल्ड ट्रंप जैसे नेता भारत पर 25 प्रतिशत टैरिफ का प्रहार करते हैं, तो नरेंद्र मोदी की सोच विरोध नहीं, विकल्प पर आधारित होती है। वे इस तरह के दबावों को एक नई दिशा में सोचने और घरेलू उत्पादन एवं वैश्विक विविधीकरण का अवसर मानते हैं। टैरिफ वार के उत्तर में मोदी की प्रतिक्रिया सकारात्मक ही होती हुई दिख रही है, वे ट्रंप के टैरिफ से प्रभावित क्षेत्रों जैसे स्टील, ऑटो पार्ट्स, टेक्सटाइल को सरकारी सब्सिडी, टैक्स रियायत और तकनीकी समर्थन के ज़रिए बल दे सकते हैं। अमेरिका के अतिरिक्त यूरोप, दक्षिण-पूर्व एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका जैसे नए बाज़ारों में भारत अपनी पकड़ को और मज़बूत करते हुए इस टैरिफ से उत्पन्न संकट को संतुलित कर सकता है।
    ट्रंप भारत को अपना मित्र मानते हैं। लेकिन यह कैसी मित्रता है, जिसमें ट्रंप को भारत के गरीबों, किसानों, मजदूरों की कोई चिंता नहीं है। लेकिन मोदी की विदेश नीति में भी ‘अमेरिका के साथ मित्रता’ है, लेकिन ‘आत्मगौरव की कीमत पर नहीं’। वे संवाद और दृढ़ता-दोनों का प्रयोग करते हैं। दबाव की राजनीति से न तो भारत झुकेगा, न रुकेगा। ट्रंप का टैरिफ हो या कोई और वैश्विक चुनौती, मोदी का भारत हर संकट में अवसर खोजता है। मोदी की आर्थिक दृष्टि एवं नीतियां किसी बाहरी राष्ट्र के मनोनुकूल नहीं, बल्कि भारत की आवश्यकताओं, संभावनाओं और स्वाभिमान के अनुरूप गढ़ी गई है। जब वैश्विक महाशक्तियां टैरिफ के हथियार से डराने लगें, तो समझो कि भारत की प्रतिस्पर्धा ने उन्हें असहज कर दिया है। मोदी इसे चुनौती नहीं, पहचान मानते हैं। मोदी कहते हैं-‘लोकल को ग्लोबल बनाओ’, और यही उनका उत्तर है हर टैरिफ, हर दबाव, हर चुनौती को। मोदी की अर्थनीति उद्यमशीलता को राष्ट्रनिर्माण से जोड़ती है। उनका आर्थिक चिंतन ‘केवल विकास’ नहीं, बल्कि स्वराज्य आधारित समावेशी आर्थिक स्वतंत्रता है। ट्रंप के टैरिफ की चुनौती को वे उसी तरह लेते हैं जैसे उन्होंने कोविड या ग्लोबल मंदी की ली थी-साहस, दूरदर्शिता और आत्मनिर्भरता के साथ।

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